बोधगया स्थित जगन्नाथ मंदिर में सांकेतिक रथयात्रा का आयोजन

बोधगया (The Bihar Now – रवि संगम की रिपोर्ट)। सोमवार को बिहार के बोधगया के महाबोधि मंदिर से उत्तर में 25 फीट की दूरी पर स्थित एकमात्र जगन्नाथ मंदिर से स्थानीय प्रशासन के आंशिक लाकडाउन के दिशानिर्देश के अनुसार ऐतिहासिक रथयात्रा का आयोजन संपन्न हुआ. कोरोना महामारी के मद्देनजर लगातार दूसरे साल इस कार्यक्रम का आयोजन सांकेतिक रूप से हुआ.

हरेक वर्ष 12 जुलाई (शुक्ल पक्ष द्वितीया) को उड़ीसा स्थित जगन्नाथपुरी से रथयात्रा के आरंभ के साथ बोधगया स्थित जगन्नाथ मंदिर से भी रथयात्रा का भव्य आयोजन होता है, जो पूरे नगर भ्रमण के साथ पूरा होता है. इसके बाद पास स्थित शंकराचार्य मठ के आंगन के बीच स्थित मां अन्नपूर्णा देवी मंदिर में विश्राम के साथ रथयात्रा का समापन होता है . इस दौरान यहां 3 दिन भक्तों के लिए विशाल भंडारा का आयोजन होता है.

लेकिन इस साल भी कोरोना महामारी को ध्यान में रखते हुए रथयात्रा का यह कार्यक्रम सांकेतिक मात्र हुआ. इस बार रथयात्रा मंदिर परिसर में ही आयोजित किया गया जिसमें प्रांगण के एक छोर से दूसरे छोर की तरफ रथ को ले जाया गया. इस बार भी रथयात्रा में आम श्रद्धालु शामिल नहीं हो सके.

हर साल रथयात्रा के 17 दिनों पूर्व कलश-यात्रा का आयोजन होता है. इसमें पवित्र निरंजना नदी से जल लेकर नगर भ्रमण करते हुए मंदिर में भगवान जगन्नाथ का व्यापक जलाभिषेक (देवस्नान) होता है. जलाभिषेक के समय श्रीकृष्ण, बलराम व देवी सुभद्रा की मूर्तियों को गर्भगृह से निकाल कर खुले बरामदे में रखा जाता है.

इस देवस्नान में 35 कलश से जलाभिषेक भगवान जगन्नाथ पर 33 कलश से जलाभिषेक बलभद्रजी पर 22 कलश से जलाभिषेक देवी सुभद्रा पर और 18 कलश से जलाभिषेक सुदर्शनजी पर किया जाता है. इस तरह कुल 108 कलश से देवस्नान का विधान है.

फिर भगवान 15 दिनों के लिए रूग्न विश्राम में चले जाते हैं. जिस दिन मंदिर का पट खुलता है, उस दिन मंदिर में भगवान जगन्नाथ की अष्टकालीन सेवा के तहत 56 भोगों के साथ विशेष पूजा का आयोजन होता है.

वैसे तो हरेक साल स्थानीय लोग भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र एवं बहन सुभद्रा के पावन रूवरूपों से सजे रथ की रस्सी खींचने के लिए आतुर रहते हैं. लेकिन इस बार लगातार दूसरे साल लोग अपने घरों में ही कैद रहे. फिर भी सभी भक्तगणों ने अपने घरों से ही भगवान श्रीजगन्नाथ को प्रणाम किया. सबने भगवान से कोरोना संक्रमण के नाश होने एवं खुशहाली का आशीर्वाद मांगा.

सोमवार प्रातः पांच बजे वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मंदिर के आचार्यों की देखरेख में मंदिर के गर्भगृह में भगवान श्रीजगन्नाथ, माता सुभद्रा तथा बलभद्र की विधिवत रूप से पूजा की गई. उसके बाद सबों की प्रतिमाओं की विधिवत आराधना की गयी. फिर तीनों रथो की पूजा हुई.

फिर भगवान की प्रतिमा को रथ पर शंख की ध्वनि के साथ बिठाया गया और मंदिर परिसर में ही घुमाया गया. मंदिर परिसर में सोशल डिस्टेंस में मौजूद श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया. ‘जय जगन्नाथ’ के उद्घोष से मंदिर का माहौल भक्तिमय हो गया.

शास्त्र के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन से कलशयात्रा के बाद मंदिर का पट बन्द कर दिया जाता है.