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भ्रष्टतंत्र को समाजवादी तंत्र क्यों नहीं कहते ये समाजवादी ?

पटना (TBN – वरिष्ठ पत्रकार अनुभव सिन्हा की रिपोर्ट)| घटना रोहतास जिले के सूर्यपुरा प्रखंड (Suryapura block of Rohtas district) में स्थित धर्मागतपुर नामक एक गांव की है. इस छोटे से गांव की एक छोटी-सी बच्ची की संवेदनशीलता छोटी नहीं कही जा सकती. उसे आशंका है कि बिक्रमगंज के आवासीय विद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रहा उसका बडा़ भाई दुर्गा पूजा की छुट्टियों में जब घर आयेगा, तब उसे भी नशे की लत लगा दी जायेगी. इसलिए उसने शराब और हेरोइन के खिलाफ गांव में आन्दोलन शुरु कर दिया है. गांव के सारे बच्चे उसके नेतृत्व में इस आन्दोलन में शामिल हैं.

इस गांव के सरकारी विद्यालय में ललन पासवान प्रधानाचार्य हुआ करते थे. शिक्षण कार्य के प्रति अपने समर्पण से उन्होंने प्रतिष्ठा अर्जित की थी. उन्होंने अपने दो बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाई. दोनों नौकरी करते थे. पर दोनो ने नौकरी छोड़ दी और गांव चले आए. आज दोनों भाई नशे की गिरफ्त हैं. कोमल उसी परिवार की बच्ची है और अपने पिता तथा चाचा की स्थिति देखने के बाद अपने बडे़ भाई को नशे की लत से बचाने के लिए आन्दोलन रत है.

यहां आइए और शराब, हेरोइन आराम से पाइए

लेकिन बिहार के मौजूदा समाजवादी तंत्र में उत्पाद विभाग के अधिकारी और कर्मचारियों के कानों तक जिले के दावथ थाना क्षेत्र के धर्मागतपुर गांव में चल रहे आन्दोलन की गूंज नहीं पहुंची है. जबकि पांचवी वर्ग की छात्रा 9 वर्षीय कोमल ने बाजाप्ता एक बैनर तैयार किया है. वह इस बैनर को गांव के बाहर प्रवेश मार्ग पर लगायेगी. “यहां आइए और शराब, हेरोइन आराम से पाइए” नारे का यह बैनर बच्चों की शरारती करतूत समझ कर उत्पाद विभाग या जिला प्रशासन अनदेखी कर दे तो यह कोई हैरत की बात नहीं होगी. फिलहाल विभागीय स्तर पर सक्रियता के अभाव से यह आशंका प्रबल होती है कि उत्पाद विभाग इसे बच्चों का खेल तो नहीं समझ बैठा है ?

ऐसा मानने का कारण भी है. सात साल से ज्यादा हो गए बिहार में शराबबंदी के. लेकिन शराबबंदी के थोडे़ समय बाद से ही पुलिस और उत्पाद विभाग पर शराब तस्करी को बढ़ावा देने का आरोप लगातार जारी है. शराब तस्करों ने समानांतर अर्थव्यवस्था बना रखी है, सरकार को इसकी जानकारी है, फिर भी शराबबंदी पर पूर्णतः रोक का सरकारी दावा कभी धूमिल नहीं हुआ.

समाजवादियों को इसकी भनक तक नहीं

लेकिन छोटी सी बच्ची कोमल की संवेदनशीलता ने पूरे गांव को झकझोर दिया. पर, नीतीश कुमार (Nitish Kumar) जैसे समाजवादी को इसकी भनक तक नहीं लगी है. दरअसल, समाजवादियों की यही खासियत होती है कि अपनी राजनीति में वह गरीब-गुरबे, दलित-पिछडे़ की बात गला फाड़ कर करते हैं, समाज की बात नहीं करते. आपको याद होना चाहिए. कुछ वर्ष पूर्व एक्जिविशन रोड (Patna Exhibition Road) में एक युवती के साथ छेड़खानी करते हुए असामाजिक तत्वों ने उसके कपडे़ फाड़ दिए थे. तब नीतीश कुमार ने समाज को दोष दिया था. हालांकि, समाज सुधारक बनने की फिराक में ही उन्होने शराबबंदी लागू की. इसके फेल हो जाने पर हाईकोर्ट से लताड़ भी पड़ती रही, लेकिन शराबबंदी का समाजवादी दावा आज भी है कि यह फेल नहीं है.

यह समाजवाद का ही करिश्मा है कि अपराधी तो दूर, लालू यादव (Lalu Yadav) को उसके समर्थक सजायाफ्ता तक नहीं मानते. और पूरे ठस्से के साथ लालू यादव जैसा समाजवादी वोट देने और चुनाव लड़ने से वंचित हो जाने के बावजूद सरकार का सर्वेसर्वा है. ऐसे समाजवादियों के सत्ता संचालन के केंद्र में होने पर कोमल जैसी बच्ची शराबबंदी के पाखण्ड के खिलाफ जब खडी़ होती है, तब यह स्पष्ट होता है कि समाजवाद की दुर्दशा क्यों है और कैसे विपन्न समाजवादी सम्पन्न हो गए. लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि कोमल का प्रयास रंग लायेगा और इन समाजवादियों की कलई फिर नए तरीके से खुलेगी.