पर्याप्त सर्वेक्षण का बांट जोहता कोशी क्षेत्र का एकमात्र पौराणिक सूर्यमंदिर

पटना / सहरसा (TBN – रवि संगम की इक्स्क्लूसिव रिपोर्ट)| सहरसा (Saharsa) से 16 कि.मी. पश्चिम, बनगांव से 3 कि.मी. उत्तर-पूर्व में, कंदाहा (Kandaha) स्थित ‘बिहार के पौराणिक सूर्यमंदिरों’ में इस मंदिर का भी विशिष्ठ स्थान है. 14 वीं सदी का यह सूर्यमंदिर, बिहार सरकार द्वारा सुरक्षित घोषित स्मारक की सूची में शामिल होने के बावजूद प्रायः उपेक्षित है. मंदिर परिसर व मंदिर के गर्भगृह में कई ‘दुर्लभ प्राचीन मूर्तियां और अभिलेख’ हैं, जिनकी महत्ता की जानकारी गिने – चुने लोगों तक ही सीमित है. इस प्राचीन देवस्थल के पर्याप्त सर्वेक्षण व प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है.

कोशी क्षेत्र का यह एकमात्र सूर्यमंदिर (Sun Temple) है. इस प्राचीन सूर्यमंदिर को मार्केंडयार्क सूर्यमंदिर (Markandeyark Sun Temple) के नाम से भी जाना जाता है. माना जाता है कि इस सूर्य मंदिर का निर्माण 1431 ई. में वंशधर (Vanshdhar) नाम के ब्राह्मण ने राजा नरसिंह देव की आज्ञा से करवाया था.

मंदिर के गर्भगृह में सात घोडों पर सवार, सूर्य की मूर्ति स्थापित है. सूर्यमूर्ति का बायां हाथ व कमल खंडित है. गले में हार, यज्ञोपवीत, कान में कुंडल आदि स्पष्ट हैं. शिलापीठिका पर अलंकरण भी है. सूर्यमूर्ति के बांयी ओर गणेश और दाहिनी ओर शिवमूर्ति स्थापित है. ये सभी मूर्तियां पालकालीन (8वीं -10वीं सदी ई.) हैं.

मंदिर द्वार के दो प्रस्तर खंडों पर ओइनवार वंशीय नरेश नरसिंह देव का अभिलेख उत्कीर्ण है. इस अभिलेख में हरिसिंहदेव और उनके पुत्र नरसिंहदेव की विरूदावली अंकित है. शिलालेख के अनुसार 14 वीं सदी में मिथिला पर ‘कर्नाटक के राजा नरसिंहदेव’ का शासन था. इस स्थल से विग्रहपाल तृतीय का एक ताम्रपत्र भी मिला है, जिसमें सूर्यमंदिर होने का उल्लेख मिलता है. कंदाहा का प्राचीन नाम कंचनपुर (Kanchanpur) था. बाद में मुगलशासक कलापहद् ने इस मंदिर को क्षतिग्रस्त कर दिया था, जिसका जीर्णोद्धार प्रसिद्ध संत लक्ष्मीनाथ गोसाई ने कराया था.

आस्था है कि कन्दाहा स्थित सूर्यमंदिर मे भगवान भास्कर की प्रतिमा उनके द्वारा प्रथम राशि मेष में स्थापित प्रतिमा है. आज भी वैशाख मास में जब सूर्यदेव मेष राशि में प्रवेश करते हैं, तब सूर्य की प्रथम किरण सूर्यप्रतिमा के दायों हाथ में बने चक्र पर पड़ती है.

सूर्यकूप : कन्दाहा स्थित सूर्यमंदिर के सूर्यकूप के जल का उपयोग लोग पूजा के साथ साथ चर्मरोंगों के इलाज के लिए औषधि के रूप में भी करते थे. इस कूप का जल लेने हेतु कोसी क्षेत्र के अलावा नेपाल व बंगाल से भी लोग यहां पहुंचते हैं.

कोशी क्षेत्र का यह एकमात्र सूर्यमंदिर है, जहां हजारों लोग सूर्य उपासना के लिये आते हैं. इसके पुरातात्त्विक महत्त्व के देखते हुए पुरातत्त्व निदेशालय, बिहार द्वारा इसे ‘सुरक्षित घोषित स्मारक’ की सूची में रखा गया है.

लोकेशन

सहरसा से 16 कि.मी. पश्चिम, बनगांव से 3 कि.मी. उत्तर.पूर्व में, कंदाहा स्थित (तारा स्थान जाने के मार्ग में , गोरहो घाट चौक से 3 कि. मी. उत्तर में ग्राम-महवारा महिषी , पंचायत – पसतवार) .

इस भूभाग का ऐतिहासिक महत्त्व

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, सहरसा क्षेत्र को बौद्धकालीन (6ठी सदी इ. पू.) प्राचीन नगर की राजधानी ‘आपण’ के रूप में पहचान की जाती है. आज यहां कई प्रसिद्ध पौराणिक-धार्मिक स्थलें हैं, जिनका विशेष महत्त्व है. बिहार के प्रमुख शक्तिपीठों में एक शक्तिपीठ (जहां देवी सती का अंग गिरा था) यहां भी है. कंदाहा स्थित सूर्यमंदिर व विराटपुर स्थित पौराणिक महत्त्व का प्राचीन चंडी स्थान के दर्शन के लिए भी बड़ी संख्या में लोग आते हैं. इस स्थल पर पुरातात्विक महत्त्व के कई प्राचीन टीले हैं, जहां से खुदाई में बौद्धकालीन अवशेष मिले हैं .

विवरण

जिला – सहरसा
कमिश्नरी – कोसी
मुख्यालय – सहरसा
सबडिविजन – सहरसा सदर, सिमरी.बख्तियारपुर
जनसंख्या – 15,06,418 (15 लाख)
क्षेत्रफल – 1,195.60 वर्ग कि.मी.
सड़क मार्ग – पटना से 256 कि.मी. दूर
रेलमार्ग – निकटवर्ती रेलवे स्टेशन – सहरसा
निकटवर्ती मुख्य रेलवे स्टेशन – हाजीपुर, पटना
वायुमार्ग – निकटवर्ती हवाई अड्डा – पटना
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