शाहीन बाग धरना फ्लॉप शो साबित

 

शाहीन बाग का धरना फ्लॉप शो साबित होता नज़र आ रहा है। दिल्ली के शाहीन बाग इलाक़े में धरना दे रहे प्रदर्शनकारियों के लिए ये धरना गले की हड्डी बन चुका है जो न निगले बन रही और न उगले। आंदोलनकारियों में धरने को लेकर आपस में अलग अलग मत बन गए हैं। कुछ लोग धरना खत्म करना चाह रहे हैं और कुछ इसको और लम्बा खींचना चाह रहे हैं लेकिन फंडिंग खत्म होने की वजह से इस आंदोलन की कमर टूट रही है। जो लोग इस आंदोलन का हिस्सा बने हुए हैं उनमे ज्यादातर बेरोजगार या महिलाएं हैं। जिनके पास शाहीन बाग़ धरने में बैठने के लिए पर्याप्त समय है। कुछ छुटपुट नेता या बिपक्ष के नेता शाहीन बाग़ में अपनी राजनीति की रोटियां सेंकने भी आ जाते हैं। चंद लोगो को अगर छोड़ दिया जाये तो बाकी बची समझदार जनता को ये समझ में आ ही चुका है कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के नाम पर राजनेता अपनी राजनीति चमकाने के मकसद से ही आते हैं। इनका जनता के हित से कोई लेना देना नहीं है।

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के लागू होने की बात जैसे ही मीडिया के जरिये लोगों में फैली विपक्षी दल और विपक्षी दल की सहयोगी मीडिया ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ दुष्प्रचार प्रारम्भ कर दिया और हर तरफ ये बात फैला दी गयी कि भारत देश के सभी मुस्लिम नागरिकों की नागरिकता रद्द कर दी जाएगी और उनको देश से निकाल दिया जायेगा। मुस्लिम वर्ग के लोग इस बात से इतने उग्र हो गए कि उन्होंने सरकार के इस कानून के खिलाफ जंग छेड़ दी। जिसमें आगे चलकर जामिया, JNU और फिर सारा देश आंदोलनकारियों के रूप में देश में तोड़फोड़ धरना प्रदर्शन करने लगे। अंततः शाहीन बाग़ के रूप में प्रदर्शनकारियों को धरने के लिए एक ठिकाना मिल गया। लेकिन अब धीरे धीरे शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों की ये समझ में आता जा रहा है कि CAA और NRC का भारत में रह रहे मुस्लिम नागरिकों की नागरिकता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। अधिकतर प्रदर्शनकारी ये बात समझ चुके हैं कि भारत में रहने वाले सभी धर्म के लोग भारतीय नागरिक हैं। ऐसी स्तिथि में अब इस आंदोलन और बेवजह प्रदर्शन का कोई मतलब नहीं रह जाता है।