शराबबंदी: बिहार सरकार को सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार

नई दिल्ली / पटना (TBN – The Bihar Now डेस्क)| उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) ने बिहार में शराबबंदी कानून के कारण बढ़ने वाले मुकदमों को लेकर बिहार सरकार को कड़ी फटकार लगाई है. न्यायालय ने कहा है कि शराबबंदी से संबंधित केसों ने अदालतों का दम घोंट रखा है. शीर्ष न्यायालय ने कहा कि इन केसों के कारण पटना हाईकोर्ट का कामकाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है.

दरअसल, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) एनवी रमना (Chief Justice of India N V Ramana) की अध्यक्षता वाली पीठ ने 40 शराब तस्करों की जमानत रद्द कराने सुप्रीम कोर्ट पहुंची बिहार सरकार की याचिकाओं के निष्पादन के दौरान यह बात कही. सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार के इन सभी अपीलों को एक साथ खारिज कर दिया.

पटना हाईकोर्ट (Patna High Court) ने उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) को बताया है कि राज्य में शराबबंदी लागू होने के कारण जमानत आवेदनों में “अभूतपूर्व वृद्धि” हुई है और लगभग 25 प्रतिशत नियमित जमानत याचिकाएं केवल बिहार मद्य निषेध और उत्पाद अधिनियम (Bihar Prohibition and Excise Act) के तहत दायर की जा रही हैं.

पटना हाईकोर्ट ने यह बात 40 शराब तस्करों की जमानत रद्द कराने सुप्रीम कोर्ट पहुंची बिहार सरकार के खिलाफ दायर अपने हलफनामे में कही. इस हलफनामे में उच्च न्यायालय ने कहा कि वह अपनी स्वीकृत जजों की संख्या के आधे से भी कम जजों के साथ काम कर रहा है और जमानत आवेदन दाखिल करने में वृद्धि के कारण नियमित जमानत याचिकाओं (regular bail pleas) के निष्पादन में देरी हो रही है.

पटना हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया कि फिलहाल कुल 39,622 जमानत आवेदन, जिसमें 21,671 अग्रिम और 17,951 नियमित जमानत आवेदन शामिल हैं, निर्धारित पीठों के समक्ष लंबित हैं. इसके अलावा 20,498 एंटीसीपेटरी और 15,918 रेगुलर जमानत आवेदनों सहित 36,416 ताजा जमानत आवेदनों पर अभी विचार किया जाना बाकी है.

न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी (Justices Ajay Rastogi) और न्यायमूर्ति अभय एस ओका (Abhay S Oka) की पीठ ने पटना उच्च न्यायालय के समक्ष जमानत आवेदनों के लंबित होने और विचाराधीन कैदियों की जमानत याचिकाओं की सुनवाई में देरी के कारण लंबे समय तक जेल में रहने पर गंभीर चिंता व्यक्त की.

इसने मामले के पक्षकारों और अदालत में मौजूद अधिवक्ता शोएब आलम (Shoeb Alam, advocate) से सुझाव मांगे.

पटना हाईकोर्ट ने अपने हलफनामे में कहा है, “इस स्तर पर, यह उल्लेख करना भी प्रासंगिक है कि बिहार राज्य में शराबबंदी लागू होने के कारण नियमित जमानत आवेदनों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है. मोटे तौर पर 25 फीसदी नियमित जमानत के आवेदन बिहार आबकारी अधिनियम के तहत आ रहे हैं. इससे नियमित जमानत याचिकाओं के निपटारे में देरी हुई है”.

शीर्ष अदालत ने कहा कि यह चिंता का विषय है कि पटना हाईकोर्ट में केस को सूचीबद्ध करने में एक साल का समय लग रहा है. जबकि इतने समय में नियमित जमानत आवेदन निष्पादित किए जा सकते थे.

शीर्ष अदालत की पीठ ने छोटे अपराधों और मजिस्ट्रेट के विचारणीय अपराधों का जिक्र करते हुए टिप्पणी की: “जब एक बार जांच खत्म हो गई है और चार्जशीट दाखिल हो गई है, तो जमानत क्यों नहीं दी जानी चाहिए.”

हालांकि, पीठ ने कहा कि वह उच्च न्यायालय के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करेगी, लेकिन वह विचार करने के लिए हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष सुझाव रखेगी क्योंकि यह वही है जो जमीनी हकीकत से अवगत है और अदालत के कामकाज को सुसंचालित करने के लिए सबसे उपयुक्त है.

CJI ने बिहार सरकार की ओर से पेश वकील मनीष कुमार से कहा, “आप जानते हैं कि इस कानून (बिहार निषेध और उत्पाद शुल्क अधिनियम, 2016) ने पटना हाईकोर्ट के कामकाज में कितना प्रभाव डाला है और केस को सूचीबद्ध करने में एक साल लग रहा है. वहां (बिहार में) सभी अदालतें शराब की जमानत के मामलों में उलझी हुई हैं.”

बताते चलें, सुप्रीम कोर्ट के इन टिप्पणियों का काफी महत्व है क्योंकि सीजेआई ने हाल ही में आंध्र प्रदेश के अमरावती में एक समारोह में बिहार शराब निषेध कानून का उल्लेख किया था और कहा था कि इसके परिणामस्वरूप अदालतों और राज्य उच्च न्यायालय में बहुत सारे जमानत आवेदन दाखिल हुए हैं.

बिहार के नीतीश सरकार पर CJI ने परोक्ष रूप से प्रहार करते हुए कहा था कि कानून बनाने में दूरदर्शिता की कमी सीधे तौर पर अदालतों में रुकावट पैदा कर सकती है.