हमारे पूर्व प्रधानमंत्री जिनका बैंक बैलेंस था मात्र 365 रुपये

रांची (वरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश ‘अश्क’ की खास रिपोर्ट)| देश के कई राज्यों में ऐसे-ऐसे सीएम बने, जिनकी संपत्ति ने सबको चौंकाया. कई तो अकूत अर्जित संपत्ति के आरोप में जेल तक गये. आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोप कई केंद्रीय मंत्रियों पर भी लगते रहे हैं.

लेकिन इसी देश के प्रधानमंत्री रहे लालाबहादुर शास्त्री को 12 हजार रुपये की एक कार खरीदने के लिए बैंक से लोन लेने की नौबत आयी. इतना ही नहीं, निधन के बाद उनके खाते में 365 रुपये 35 पैसे ही मिले थे.

भारतीय राजनीति में जयललिता, लालू प्रसाद यादव, मधु कोड़ा, ओमप्रकाश चौटाला, सुखराम जैसे कई नेता इसलिए चर्चित हुए कि उन्हें आय से अधिक या गलत तरीके से धन अर्जित करने के आरोपों में जेल की सीखचों तक जाना पड़ा या जांच एजेंसियों का उन्हें अब भी सामना करना पड़ रहा है. कई राज्यों में ऐसे-ऐसे सीएम बने, जिनकी अकूत संपत्ति ने सबको चौंकाया. आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोप कई केंद्रीय मंत्रियों पर भी आरोप लगते रहे हैं.

लेकिन इसी देश का एक ऐसा प्रधानमंत्री भी हुआ, जिसने ईमानदारी की मिसाल कायम की. यह अलग बात है कि ऐसे लोगों की चर्चा अब बेमानी हो गयी है. जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद प्रधानमंत्री बने लालाबहादुर शास्त्री इसके ज्वलंत उदाहरण हैं. उनकी निर्धनता और ईमानदारी के बारे में अब जानने के लिए इक्का-दुक्का बचे बुजुर्गों के किस्से हैं या कुछ लोगों की किताबें.

ओम प्रकाश अश्क, लेखक/पत्रकार

किताबों के ऐसे ही किस्सों में एक किस्सा यह भी दर्ज है कि शास्त्री जी के बेटे ने उनके प्रधानमंत्री रहते एक कार खरीदने की जिद की. कार की कीमत तब 12 हजार रुपये थी. शास्त्री जी के पास मात्र 7 हजार ही थे. उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से 5 हजार रुपये इस वादे के साथ कर्ज लिये कि एकमुश्त लौटा देंगे. यह अलग बात है कि कर्जा चुकाने के पहले ही उनका निधन हो गया.

आज के राजनीतिज्ञों और नयी पीढ़ी के लोगों को यह जान कर आश्चर्य ही होगा कि 12 हजार रुपये की एक कार खरीदने के लिए इस देश के प्रधानमंत्री को बैंक से लोन लेने की नौबत आयी. आजादी के डेढ़-दो दशक बाद तक ऐसे लोग राजनीति में रत्न के रूप में दिखते थे, लेकिन उसके बाद लगातार राजनीति में ईमानदारी का लोप होता गया और अधिकतर राजनीतिज्ञों के लिए तो राजनीति अब धन अर्जित करने का पेशा मात्र बन गयी. ईमानदारी, नैतिकता और चरित्र सिरे से गायब होते जा रहे हैं.

लालबहादुर शास्त्री की ईमानदारी और सादगी के कई किस्से हैं. प्रधानमंत्री रहते एक बार उनके बेटे सुनील शास्त्री ने सरकारी वाहन का निजी इस्तेमाल किया. जब इस बात की जानकारी शास्त्री जी को हुई तो उन्होंने बेटे को साफ-साफ समझा दिया कि सरकारी वाहन प्रधानमंत्री के लिए मिला है, उनके परिवार के सदस्यों के इस्तेमाल के लिए नहीं है. इतना ही नहीं, उन्होंने ड्राइवर से लाग बुक मांग कर देखा और बेटे ने जितने किलोमीटर की यात्रा की थी, उसके पैसे सरकारी खजाने में जमा कराये.

शास्त्री जी की ईमानदारी व बेबाकी का एक वाकया और है. स्वतंत्रता संग्राम में वे जेल में थे. निर्धन परिवारों के जो लोग जेल में थे, उनके परिवार का खर्च चलाने के लिए कांग्रेस से जुड़े नेता लाला लाजपत राय ने 50 रुपये मासिक सहायता की व्यवस्था की. यह रकम शास्त्री जी की पत्नी को भी जाती थी. पत्नी से पत्राचार में शास्त्री जी ने पूछा कि घर का खर्च उनके जेल के बाद कैसे चल रहा है तो पत्नी ने बताया कि पार्टी से हर महीने उन्हें 50 रुपये मिलते हैं. 40 रुपये में घर का काम चल जाता है. इसके बाद शास्त्री जी ने पार्टी के उस व्यक्ति यानी लाला लाजपत राय को पत्र लिखा कि मेरे घर का मासिक खर्च 40 रुपये ही है, इसलिए इतनी ही रकम उनकी पत्नी को भेजी जाये. बचे पैसे किसी दूसरे जरूरमंद को दिया जा सकता है.

राजनीति में शास्त्री जी की ईमानदारी, सादगी और नैतिकता की चर्चा इसलिए अहम है कि बाद के वर्षों में राजनीतिज्ञों का नजरिया ही बदल गया. याद करें तो 1996 में दो चर्चित राजनीतिक घटनाएं प्रकाश में आयी थीं. तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहते जयललिता के घर से जो सामान बरामद हुए थे, उसने सबको एकबारगी चौंका दिया था. उनके घर से 28 किलो सोना, 8 क्विंटल चांदी, 750 जोड़े जूते-चप्पल, 10 हजार 500 साड़ियां और 91 घड़ियां बरामद हुए थे. उसी साल तत्कालीन केंद्रीय मंत्री और बुधवार को ही दुनिया छोड़ चले सुखराम पंडित के घर सीबीआई के छापे में इतने नोटों की बरामदगी हुई थी कि सीबीआई के तत्कालीन निदेशक जोगिन्दर सिंह ने कहा था कि अब तक के जीवन में इतने नोट उन्होंने कभी नहीं देखे हैं.

बिहार में लालू प्रसाद पर 950 करोड़ रुपये के चारा घोटाले का आरोप जगजाहिर है. इस मामले में उन्हें सजा भी हो चुकी है. अधिक उम्र और बीमारियों के कारण उन्हें फिलवक्त जमानत तो मिल गयी है, लेकिन उनके घोटालों के किस्से जगजाहिर हैं. चारा घोटाले में पशुओं और उनके चारा को स्कूटर और कार से ढोया दिखा कर घोटाले को अंजाम दिया गया था.

महज 22 साल की उम्र वाले झारखंड में तो शायद ही कोई मुख्यमंत्री बेदाग बचा हो. मौजूदा मुख्यमंत्री पर तो पद का दुरुपयोग कर अपने नाम, भाई और पत्नी के नाम पर खदान-जमीन लेने का आरोप लगा है. इतना ही नहीं, उन्हीं के अधीन खनन विभाग की सचिव पूजा सिंघल के ठिकानों से 19.31 करोड़ रुपये नकद और करीब 150 करोड़ रुपये की परिसंपत्ति के कागजात बरामद हुए हैं.

राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों के गठजोड़ का ही परिणाम है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार इस पर चिंता जताते रहे हैं. कल्याण योजनाओं के पैसे लाभुकों के खाते में ट्रांसफर करने के लिए उन्होंने जनधन खाते खुलवाने की मुहिम चलायी. प्रसंगवश यह उल्लेख भी आवश्यक है कि प्रधानमंत्री बनने पर राजीव गांधी ने तो सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया था कि केंद्र से भेजे एक रुपये में 85 पैसे बीच में ही गायब हो जाते हैं. बीच में पैसे गायब करने वाले कौन लोग होते हैं, यह सबको पता है. इनमें लोकसेवकों की भूमिका सबसे बड़ी होती है.

बिहार में ऐसे भ्रष्ट लोकसेवकों पर कार्यवाई शुरू हुई है. पिछले 15 साल में तकरीबन 4500 लोकसेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले बिहार सरकार के निगरानी विभाग की ओर से दर्ज किये गये हैं. झारखंड में अभी एक आईएएस पूजा सिंहल प्रवर्तन निदेशालय की जांच में पकड़ी गयी हैं, लेकिन उनके जैसे 11 लोकसेवकों की सूची राज्यपाल को मिली है. जाहिर है कि उनकी भी पड़ताल होगी तो घोटाले की और परतें उघड़ेंगी.

आज के संदर्भ में लालबहादुर शास्त्री को याद करना इसलिए आवश्यक है कि 40 रुपये में घर का खर्च चलने के कारण उन्होंने मिलने वाली 50 रुपये की रकम की जगह सिर्फ 40 रुपये ही भेजने की बात की. आज तो जनप्रतिनिधियों में वेतन-भत्ते बढ़ाने की होड़ लगी हुई है. ग्रामसभाओं के मुखिया तक अपने लिए वेतन-भत्ते और कई तरह की सुविधाओं की मांग करने लगे हैं.

शास्त्री जी ने जहां बेटे को सरकारी वाहन इस्तेमाल से मना किया, वहां आज के जनप्रतिनिधियों के परिजन ही नहीं, उनके चेले-चपेटे भी धड़ल्ले से सरकारी वाहन का इस्तेमाल कर रहे हैं. शास्त्री जी ने 12 हजार की कार के लिए 5 हजार लोन लिया, आज तो सरकारों ने ही कम ब्याज पर महंगी कारों के लिए लोन की छूट दे रखी है.

शास्त्री जी के निधन के बाद जब उनके बैंक पासबुक को लोगों ने देखा तो सभी दंग रह गये. उनके खाते में 365 रुपये 35 पैसे का बैलेंस था. आज की हालत समझने के लिए सिर्फ इतना ही बताना काफी है एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनाव में चुने गये 542 सांसदों में 475 करोड़पति हैं. इस संपत्ति की घोषणा उन्होंने अपने चुनावी हलफनामे में की है. करोड़पति सांसदों में टाप तीन में कांग्रेस के हैं. कांग्रेस की छिंदवाड़ा सीट से जीते नकुलनाथ की संपत्ति 660 करोड़ की है. तमिलनाडु से सांसद वसंत कुमार 417 करोड़ के स्वामी हैं. कर्नाटक के डीके सुदेश 338 करोड़ के मालिक हैं. उत्तर प्रदेश में हालिया संपन्न विधानसभा चुनाव में विजयी 403 विधायकों में 366 करोड़पति हैं. यानी 91 फीसद विधायक करोड़पति हैं. पिछले मुकाबले इस बार करोड़पति विधायकों की संख्या में 10 फीसदी का इजाफा हुआ है. 2017 के चुनाव में 80 फीसदी विधायक करोड़पति थे.

(सौ: ओम प्रकाश अश्क)