कत्थक की भाव-भंगिमाओं से सबको मोहित करने वाली मोहिनी

भोजपुर (आमोद कुमार – The Bihar Now रिपोर्ट) | कहते हैं कि आरा की मिट्टी पर कला की उपज होती है. कला के साधकों ने अपनी कला साधना से यहां की मिट्टी को काफी उर्वरता प्रदान की है. यहां कला को लेकर कला साधकों में इतना जुनून है कि उन्हें उम्र की कोई सीमा प्रभावित नहीं करती. अपनी कला साधना के प्रति उनका समर्पण नये साधकों को हमेशा प्रेरित करता रहता है.

इसी तरह आरा की एक मशहूर 80 वर्षीय कलाकार विदुषी मोहिनी देवी यूं तो किसी परिचय की मोहताज नही. 20वीं सदी के मध्य में इनकी शोहरत सिर चढ़ कर बोल रही थी. भारतीय शास्त्रीय नृत्य कत्थक के साथ साथ लोक संगीत में पारंगत हैं मोहिनी देवी.

1950 के दशक की एक नामचीन नृत्यांगना

महज 10 वर्ष की कम आयु में कत्थक नृत्य से श्रोताओं को मँत्रमुग्ध करने वाली नृत्यांगना मोहिनी को कत्थक की उच्च स्तरीय शिक्षा पखावज सम्राट बाबू ललन जी के नाम से विख्यात जमीरा के राजा संगीत शिरोमणि शत्रुंजय प्रसाद सिंह ने दी. इस दौर में जहां कोई भी बाबू ललन जी के पास बैठना शान समझते थे वैसे में मोहिनी देवी को ललन जी ने घन्टो रियाज करवाकर नृत्य में पारंगत किया.1950 के दशक में बिहार के गिने चुने नृत्यांगनाओं में मोहिनी देवी का नाम शुमार था.

बेतिया के अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन में पंडित सामता प्रसाद उर्फ गोदई महाराज व कलकत्ता क़े संगीत सम्मेलन में उस्ताद करामतूल्ला खां जैसे चोटी के तबला वादकों को कांटे की टक्कर देने वाली नृत्यांगना मोहिनी देवी के साथ उस्ताद जाकिर हुसैन के वालिद उस्ताद अल्लारखा खां साहब भी तबला संगत कर चुके हैं. इसके अलावे भी देश के बड़े बड़े संगीत सम्मेलनों में गुरू बाबू ललन जी के पखावज पर मोहिनी देवी ने नृत्य प्रस्तुत किया है.

200 घुंघरुओं में से एक घुँघरू की आवाज निकालना

मोहिनी देवी बताती हैं कि पैरों के नसों के तनाव व संतुलन के अभ्यास से 200 घुंघरुओं में से एक घुँघरू की आवाज निकालने के उनके खास अंदाज की फरमाईश काफी हुआ करती थीं. “साड़ीया लाई द बलम कलकतिया ओह में हरी हरी पत्तियां ना” गुनगुनाते हुऐ भाव भंगिमाओं से आज भी मोहित कर देती हैं मोहिनी देवी. नृत्य रत्न, कथक चूड़ामणि व लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित मोहिनी देवी को 1970 क़े दशक में रेडियो की मशहूर गायिका के रूप में काफी शोहरत मिली. आकाशवाणी के लोकप्रिय कार्यक्रम रेडियो दंगल व रेडियो पावस में विलक्षण गायकी के लिए आकाशवाणी द्वारा प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गय़ा.

सन 1987 में बिहार सरकार की ओर से मोहिनी देवी एक विशेष समारोह में गायन प्रस्तुत करने के लिए मॉरीशस भी जा चुकी हैं. अपने सांगीतिक सफर को याद करते हुऐ भावुक हो जाती है और कहती है पहले संगीत में सच्चाई हुआ करती थी किन्तु आज के संगीत में तामझाम व बनावटी बातें ज्यादा हैं. संगीत-नृत्य में लय व तैयारी ने सुकून व ठहराव का स्थान ले लिया है.

मोहिनी देवी कहती हैं आरा शुरू से तालीम का मुख्य केंद्र रहा हैं व आज भी यहाँ उच्च स्तर की तालीम होती है. कथक गुरु बक्शि विकास ने कहा कि आरा बड़े – बड़े कलाकारों की तपोभूमि है, जिसनें हर वक्त सांस्कृतिक दृष्टिकोण से आरा को शीर्ष पर रखा है. जिसमें एक विशेष योगदान कथक नृत्यांगना विदुषी मोहनी देवी जी का भी. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हमें गर्व है कि हम आरा की भूमि पर अपनी साधना करते हैं.

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