गंगा दशहरा आज, कोरोना की वजह से घरों पर मनाया जा रहा त्योहार

गंगा दशहरा आज
कोरोना की वजह से लोगों का हुजूम नहीं पहुंचा गंगा किनारे
घरों पर मनाया जा रहा त्योहार

पटना (TBN डेस्क) | आज गंगा दशहरा का त्योहार मनाया जा रहा है, जिसका सनातन धर्म में विशेष महत्व है. वैसे कोरोना का खतरा और लॉकडाउन के बीच इस बार गंगा दशहरा का त्योहार फीका है.

सनातन वैदिक धर्म में गंगा दशहरा का विशेष महत्व है. गंगा दशहरा का पर्व हर साल जेष्ठ शुक्ल दशमी को मनाया जाता है जोकि इस बार 1 जून 2020, सोमवार यानी आज मनाया जा रहा है.

गंगा दशहरा का महत्त्व

कहा जाता है कि जिस दिन माँ गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई उस दिन एक बहुत ही अनूठा और विशेष मुहूर्त था. उस दिन ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथी थी, हस्त नक्षत्र, व्यतिपात योग, गर योग, आनंद योग, कन्या राशि में चंद्रमा और वृषभ में सूर्य. इस प्रकार दस शुभ योग उस दिन बन रहे थे. मान्यता है कि इन सभी दस शुभ योगों के प्रभाव से गंगा दशहरा के पर्व में जो भी व्यक्ति गंगा में स्नान करता है या सुमिरन करता है उसके अज्ञान या आवेश मे आकर किए हुए ये दस प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं इसके लिए पश्चाताप भी जरूरी है.

जिन पापों के नष्ट होने की चर्चा की जाती है उसमें जबरन किसी की वस्तु लेना, हिंसा, पराई स्त्री के साथ समागम, कटुवचन का प्रयोग, झूठ बोलना, शिकायत करना, किसी औऱ की संपत्ति हड़पना या हड़पने की इच्छा करना, दूसरे को हानि पहुँचाना आदि शामिल है.

कहा जाता है कि जिस किसी ने भी उपरोक्त पापकर्म किये हैं और जिसे अपने किये का पश्चाताप है और इससे मुक्ति पाना चाहता है तो उसे सच्चे मन से मां गंगा में डूबकी अवश्य लगानी चाहिये. यदि आप मां गंगा तक नहीं जा सकते हैं तो गंगा जल में स्वच्छ जल मिलाकर मां गंगा का स्मरण कर उससे भी स्नान कर सकते हैं.

कैसे करें गंगा की पूजा

इस दिन गंगा मैया के दर्शन कर उनके पवित्र जल में स्नान करें या स्वच्छ जल में ही मां गंगा को स्मरण करते हुए स्नान करें. यदि आपके पास गंगाजल हो तो उसको जल में मिला लें. मां गंगा की प्रतिमा के पूजा का विशेष महत्व है. गंगा पूजा के समय भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व है क्योंकि भगवान शिव ने ही गंगा जी के वेग को अपनी जटाओं पर धारण किया.

पुराणों में वर्णन के अनुसार राजा भागीरथ ने माँ गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने के लिए बहुत तपस्या की थी. भागीरथ के ताप से प्रसन्न होकर माँ गंगा ने भागीरथ की प्रार्थना स्वीकार की किन्तु गंगा मैया ने भागीरथ से कहा, “पृथ्वी पर अवतरण के समय मेरे वेग को रोकने वाला कोई चाहिए अन्यथा मैं धरातल को फाड़ कर रसातल में चली जाऊँगी और ऐसे में पृथ्वीवासी अपने पाप कैसे धो पाएंगे”.

राजा भागीरथ ने माँ गंगा की बात सुनकर प्रभु शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की. भागीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर प्रभु शिव ने गंगा माँ को अपने जटाओं में धारण किया. पृथ्वी पर अवतरण से पूर्व माँ गंगा ब्रहमदेव के कमंडल में विराजमान थी. अतः गंगा मैया पृथ्वी पर स्वर्ग की पवित्रता साथ लेकर आई थी. इस पावन अवसर पर श्रद्धालुओं को माँ गंगा की पूजा-अर्चना के साथ अपने सामर्थ्य के अनुसार दान भी करना चाहिए.

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