पर्यटन मानचित्र पर अब तक नहीं आ पाया बिहार का यह पौराणिक सूर्यमंदिर

पटना (The Bihar Now – रवि संगम की खास व इक्स्क्लूसिव रिपोर्ट)। पौराणिक, ऐतिहासिक महत्व के पर्यटक स्थलों के विकास की कोई कार्य-योजना राज्य सरकार के पास नहीं है. इसका स्पष्ट प्रमाण है, देश के 12 पौराणिक सूर्यमंदिरों में से एक, गया (Gaya) स्थित यह प्राचीन सूर्यमंदिर (Sun Temple). हास्यास्पद है कि इस सूर्यमंदिर की महत्ता को पर्यटन विभाग के प्रचार-प्रसार में भी अब तक नहीं शामिल किया गया है.

गया में विष्णुपद मंदिर (Vishnupad Mandir) से 150 गज उत्तर में, सूर्यकुंड (Surya kund) के किनारे स्थित यह सूर्यमंदिर, अति प्राचीन धार्मिक महत्त्व का स्थल है. सूर्यकुण्ड के पश्चिम, यह ‘पालकालीन सूर्यमंदिर’ स्थापित है, जिसे दक्षिणार्क सूर्यमंदिर (Dakshinark Sun Temple) के नाम से भी जाना जाता है. सूर्यमंदिर व सूर्यकुंड, गया यहां संध्याकालीन सूर्य आदित्य के रूप में मौजूद हैं.

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, पाल शासकों (बिहार में 1199 ई. में) ने इस पवित्र स्थल का उचित संरक्षण किया था. बाद में इस मंदिर व परिसर का कई बार जीर्णोद्धार हुआ. इस सूर्यमंदिर व सूर्यकुंड के घाट व चाहरदिवारी का टेकारी नरेश महाराज मित्रजीत सिंह (Mitrajeet Singh) ने 1850 ई. में पुर्ननिर्माण करवाया था. फिर आधुनिक काल में सन् 1993 ई. में सूर्यमंदिर का जीर्णोद्धार हुआ .

राज्य के प्राचीन सूर्यमंदिरों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान हैं. अनादिकाल से मुक्तिधाम गया (Muktidham Gaya) सूर्य के विभिन्न रूपों की उपासना का केन्द्र रहा है.

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इस सूर्यमंदिर में सूर्यनारायण की ‘चतुर्भुज मूर्ति’ (Chaturbhuj Murti) स्थापित है. यह मूर्ति गया से खनन में प्राप्त, 10 वीं सदी की, काले पत्थर (Black Stone) से निर्मित सूर्यमूर्ति जिसकी ऊंचाई लगभग 4 फीट और व्यास 2.6 फीट है. इसके उत्तरी भाग को उदीची, दक्षिणी भाग को दक्षिण मानस व मध्य भाग को कनखल तीर्थ कहा जाता है.

सूर्यकुंड : सूर्यमंदिर के बगल में स्थित सूर्यकुंड का गया के ‘प्रमुख कुंडों’ में विशेष महत्त्व है. यह मगध प्रदेश का प्राचीनतम गहरा तालाब है. इस पवित्र सूर्यकुंड को दक्षिण मानस कुंड के नाम से भी जाना जाता है. यहां गया आने वाले श्रद्दालू बड़ी संख्या में आकर पिंडदान करते हैं.

समुद्रतल से 124 मीटर ऊंचाई पर स्थित, मुख्यमार्ग से लगी सीढ़ी से नीचे उतरते ही, पूर्वाभिमुख मुख्यद्वार युक्त (पूर्व की ओर मुख्य द्वार ), इस सरोवर के दर्शन से ही इसके सौंदर्य का आभास हो जाता है.

सूर्यपूजा के कारण महत्त्वपूर्ण इस 292 फीट लंबे और 153 फीट चौड़े सरोवर की चर्चा प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार बुकानन हेमिल्टन (1762 – 1829 ई.) (Buchanan Hamilton) ने भी की है. सन् 1850 ई. के बाद, वर्ष 1987 में इस सरोवर का पुनः जीर्णोद्धार किया गया. इस सूर्यकुंड पर चैत्र व कार्तिक मास में छठ पर्व पर विशाल मेला लगता है .

पौराणिक महत्ता

पुराणों में प्रातःकालीन सूर्य, मध्याह्नकालीन सूर्य एवं संध्याकालीन सूर्य का उल्लेख हैं. उल्लेखनीय है कि पौराणिक सूर्यमंदिरों में देव सूर्यमंदिर, औरंगाबाद में एक ही मंदिर में तीनों-काल के सूर्य स्थापित हैं, जबकि गया में तीनों काल के सूर्यमंदिर अलग-अलग स्थापित हैं, जो इस प्रकार हैं –
शीतला मंदिर, पितामहेश्वर घाट (Sheetala Mandir, Pita Maheshwar Ghat)– यहां प्रातंकालीन सूर्य ब्रम्ह के रूप में मौजूद हैं,
शिवमंदिर, ब्राह्मणी घाट (Shiv Mandir, Bramhani Ghat)– यहां सूर्य शिव के रूप में मौजूद हैं (यहां घाट पर द्वादश आदित्य की प्रतिमा है, साथ ही प्रधान प्रतिमा पूरे सूर्य परिवार के साथ है).
सूर्यमंदिर व सूर्यकुंड, गया – यहां संध्याकालीन सूर्य आदित्य के रूप में मौजूद है .
वायुपुराण में इन मंदिरों का वर्णन है. भविष्योत्तर-पुराण से काल निर्धारण स्पष्ट होता हैं. सूर्य-महात्म में सूर्य नमन से हजार जन्म की दरिद्रता दूर होती है.

इस भूभाग का ऐतिहासिक महत्त्व

अनादिकाल से मुक्तिधाम गया सूर्य के विभिन्न रूपों की उपासना का केन्द्र रहा है. राजधानी पटना से दक्षिण-पश्चिम, गया शहर पौराणिक काल से हिन्दुओं का प्रसिद्ध धार्मिक केन्द्र रहा है. हिन्दुओं का विश्वास है कि यहां पिंड और तर्पण देने से मृत पूर्वजों को शांति व मोक्ष मिलता है. वाल्मीकि-रामायण के अनुसार राजा गय ने यह नगरी बसायी थी. महाभारत में भी युधिष्ठिर की तीर्थयात्रा के क्रम में उल्लेख है कि इस नगरी के संस्थापक राजर्षि गय थे, जिन्होंने यहां विशाल यज्ञ किया था.

‘वायु.पुराण’ (Vayu Puran) के गया-माहात्म्य (Gaya Mahatmya) के अनुसार प्राचीन गया नगर ‘गयासुर’ नामक राक्षस के नाम पर बसा, जो भगवान विष्णु (Lord Vishnu) का अनन्य भक्त था. धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि राक्षस गयासुर के कठोर तपस्या से देवताओं एवं यमराज को जब चिंता हुई तो भगवान विष्णु को इस स्थल पर साक्षात प्रकट होकर गयासुर को प्राणोत्सर्ग (स्वेच्छा से मरने के लिये) के लिये प्रेरित करना पड़ा. अंततः अपनी बलि हेतु तैयार हो जाने पर भी जब बलि संभव नहीं हो सका तो सभी देवताओं को प्रकट होकर इसके लिए कठोर प्रयास करना पड़ा. तभी से यह स्थल – पवित्र मोक्ष स्थल और देवताओं का विश्राम स्थल माना जाने लगा. गया शहर को विष्णुनगरी भी कहा जाता है. तंत्रशास्त्र के अनुसार गया भैरवीचक्र पर स्थित नगर माना जाता है.

फल्गू नदी (Phalu River) के तट पर बसे, गया नगर का इतिहास ‘बौद्ध काल (Buddha Era) से लेकर रामायण काल (Ramayan Era)’ तक जाता है, जब राम और सीता ‘फल्गू नदी’ के किनारे पिंडदान के लिये गये थे. पिंडदान की परंपरा आज भी फल्गू नदी के तट पर जारी है.

अद्भुत स्थान पर स्थित है गयाधाम

पवित्र नगरी गया प्राचीन मगध साम्राज्य का प्रमुख हिस्सा था. गयाधाम अद्भुत स्थान पर स्थित है. यहां से पूर्व दिशा में वैद्यनाथधाम और पश्चिम दिशा में स्थित काशी का विश्वनाथधाम लगभग समान दूरी पर स्थित हैं –

प्राचीन काल से गया मगध साम्राज्य का एक महत्त्वपूर्ण अंग रहा है. पूर्व में मगध का नाम कीकट था और इसे अनार्यों का निवास स्थान समझा जाता था. महाभारत के अनुसार , मगध के प्राचीन राजवंश का संस्थापक ‘बृहप्रिय’ था, जो उपरिचर का पुत्र और जरासंध का पिता था. मगध के नये राजवंश का सर्वप्रथम शासक बिंबिसार हुआ, जिसने अंग को जीतकर दक्षिण बिहार का एकीकरण किया और उसने कोसल तथा वैशाली से वैवाहिक संबंध स्थापित किये थे. इसके शासनकाल में मगध एक समृद्ध राज्य बना.

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वायु पुराण के अनुसार, फल्गु नदी के तट पर गया नगर में ऐसा कोई स्थान नहीं जहां तीर्थ न हो. उसके अनुसार किसी की संतान गयातीर्थ के लिए जाये तो उसके लिए ब्रह्मज्ञान , गोशाला में मृत्यु तथा कुरुक्षेत्र तीर्थ का वास व्यर्थ है. इस पुराण के अनुसार, गया जिन देवताओं के नाम से ख्यात है, वे सब गयासुर के शरीर को स्थिर रखने के लिए साक्षात् देवस्वरूप उनके शरीर पर बैठे हुए हैं.

गया फल्गु नदी के किनारे बना एक प्राचीन नगर है.. इसके अलावा धार्मिक एवं सास्कृतिक दृष्टि से गया का विशेष महत्त्व रहा है. रामशिला एवं ब्रह्मयोनि पहाड़ियों से घिरा यह शहर ‘मंदिरों की शिल्पकला’ के लिए भी दर्शनीय है. सात पर्वतों वाले इस शहर का वैदिक नाम ‘ब्रह्मगया’ है. वाल्मीकि रामायण व विष्णुपुराण के अनुसार सूर्य के पौत्र ‘गय’ के नाम से गया बसाया था. वामन पुराण में उल्लेख किया गया है कि गया नगरी को स्थापित करनेवाले मनु के पौत्र ‘अतुर्वरग गय’ चंद्रवंशी थे और उन्होंने ही गया नगरी को बसाया था. राजा गय ने यहां एक ऐसे यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें अन्न के ढेर कई पर्वतों ,जैसे लग रहे थे. ऐसा कोई भी जीव न बचा हो जो इस यज्ञ से तृप्त न हुआ हो.

गया में श्राद्ध का विशेष महत्त्व

प्रायः प्रत्येक तीर्थ में श्राद्ध करने का महत्त्व है, परन्तु गया में श्राद्ध का अपना अपने आप में विशेष महत्त्व है. पुराण साहित्य के अनुसार – जो मनुष्य गया पहुंच कर श्राद्ध करता है, उसके पितृगण को तृप्ति प्रदान करनेवाला जन्म सफल हो जाता है. यहां के श्राद्ध में पितरों के पूजन से साक्षात् भगवान विष्णु पूजित होते हैं. गया की कण-कण भूमि श्राद्ध के लिए उपयुक्त है. गया में पिण्डदान का धार्मिक महत्त्व बहुत ज्यादा है.

भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार सत्ययुग में गया तीर्थ को उत्तम जानकर ब्रह्माजी ने यहां सर्वप्रथम पिण्डदान किया था. उसी समय से पिण्डदान की प्रथा जारी है. उसी परंपरा को आगे बढाते हुए त्रेता युग में स्वयं भगवान श्रीराम , द्वापर युग में पितामह भीष्म, धर्मराज युधिष्ठिर, भगवान कृष्ण सहित कई महापुरुषों ने पिण्डदान किया.

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गया के पितृपक्ष में कुल 45 वेदियों पर पिण्डदान होता है. सभी वेदी पर पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह, मतामही, प्रमातामही, वृद्धप्रमातामही के नाम से 12 पिण्ड होते हैं. इसके बाद पिताकुल, माताकुल, श्वसुरकुल, गुरुकुल और नौकर को भी पिण्ड दिया जाता है.

प्राचीन समय में यहां एक वर्ष में श्राद्ध होता था. पिण्डदान करने के वेदों की संख्या प्राचीन काल में 360 थी, प्रतिदिन एक-एक वेदी पर पिण्डदान करने का प्रावधान था. अब अनेक वेदियां लुप्त हो गयीं है. यहां प्रतिवर्ष पितरों के लिए तर्पण एवं पिण्डदान के उद्देश्य से आश्विन मास की 1-15 तिथि तक, पितृपक्ष में लाखों तीर्थयात्री आते हैं.

गया में पिण्डदान करने की पौराणिक कथा

हिन्दुओं में अटूट आस्था है कि यहां पिण्डदान करने से आत्मा का स्वर्गारोहण होता है. इस विश्वास की एक पौराणिक कथा है कि असुरों में गयासुर (Gayasur) नाम से प्रसिद्ध एक बलशाली और पराक्रमी राक्षस हुआ, जो केवल तपस्या में प्रीति रखता था. उसका तप सम्पूर्ण भूतों को पीडित करनेवाला था. उसके तप से यमराज की चिंता बढ गयी और देवतागण संतृप्त हो गये. गयासुर ने दीर्घकाल तक कोलाहल पर्वत (Kolahal Mountain) पर तपस्या की. उसके इस तप से भगवान नारायण ने उसके शरीर को समस्त तीर्थों से अधिक पवित्र होने का वर दे दिया.

परिणामस्वरूप मनुष्य, गयासुर का स्पर्शमात्र कर, ब्रह्मलोक का अधिकारी होने लगा. मृत्युलोक के प्राणियों से ब्रह्मलोक की भूमि भरने लगी और अन्य लोक खाली होने लगे, इससे भयभीत हो देवतागण ब्रह्माजी के पास पहुँचे. ब्रह्माजी, भगवान शंकर के साथ देवताओं भगवान विष्णु की शरण में गये और वहाँ उन्होंने सम्पूर्ण जानकारी देते हुए अपना वर वापस लेने का आग्रह किया. भगवान विष्णु ने देवताओं से यज्ञ के लिए गयासुर के पवित्र शरीर को दान में माँग लेने की सलाह दी.

तदनुसार देवताओं ने उसके शरीर को अचल बनाने का निर्णय लिया और इस कार्य के लिए गयासुर से उसकी देह को यज्ञस्थल बनाने की मांग की. गयासुर इस कार्य के लिए सहर्ष तैयार हो गया. इसके पश्चात् ब्रह्मा ने उसके शरीर पर यज्ञ आरंभ किया. यज्ञ पूरा होने के पश्चात् गयासुर फिर उठने लगा. ब्रह्माजी ने यम को कहलाया, यम ने ब्रह्मा के आदेश पर धर्मशिला लाकर गयासुर के मस्तक पर रखा. इसके बावजूद भी उसका हिलना बंद नहीं हुआ.

तब देवतागण बेचैन हो गये. पुनः भगवान विष्णु के पास पहुँचे और उन्हें सारी बात बतायी. तब भगवान विष्णु गदाधर रूप ले प्रकट हो गयासुर के तप से प्रभावित होकर वर माँगने को कहा. तब गयासुर ने कहा कि जब तक पृथ्वी का अस्तित्व रहे, चाँद और तारे रहे, ब्रह्मा-विष्णु-महेश इस शिला पर विराजमान रहेगें. भगवान विष्णु ने एवमस्तु कहते हुए गयासुर के उपर रखे धर्मवती शिला को इतना कस के दबाया कि उनका चरण-चिन्ह स्थापित हो गया. ‘भगवान् विष्णु के चरण का छाप’ आज भी विष्णुपद मंदिर में विद्यमान है. तभी से गया एक पवित्र स्थान माना जाने लगा है.
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