भगवान, इन नौनिहालों की अब मत लो इन्तहां !

सासाराम (धनंजय तिवारी की खास रिपोर्ट) | रोहतास जिले के तिलौथू प्रखंड के कोडर गांव में रहने वाले चार बच्चों को देखकर आपका कलेजा पसीज जाएगा क्योंकि ये बच्चे अनाथ हैं. मात्र 9 साल से लेकर 4 साल तक के इन चार छोटे छोटे बच्चों की माँ 3 साल पूर्व गरीबी के कारण घर छोड़ कर चली गई और उसके बाद कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान इनके पिता की भी मौत हो गई. अब इन चारों बच्चे अनाथ हो कर दो वक्त की रोटी को मोहताज है.

पिता सुरेंद्र मिश्र अपने इन चार बच्चों की देखभाल खुद कर रहा था क्योंकि 3 साल पूर्व इन बच्चों की मां अचानक घर छोड़कर कहीं चली गई थी जों फिर वापस आई ही नहीं. इधर कोरोना महामारी के चलते जारी लॉकडाउन में सुरेन्द्र को कोई काम भी नहीं मिल रहा था. इस कारण वह परेशान व चिंतित होकर बीमार रहने लगा. इस बीच अचानक पिछले महीने 23 मई को उसकी मौत हो गई.

पिता की मौत के बाद ये चारों बच्चे पूरी तरह से अनाथ हो गए हैं जिन्हे देखने सुनने वाला कोई नहीं है. अब स्थिति यह है कि मिट्टी के दीवार वाला इनका घर रहने लायक भी नहीं है क्योंकि बरसात में टपकते छत वाला यह मकान कब गिर जाए, कोई नहीं जानता. आसपास के लोग कुछ चावल आटा दे दे तो लगभग 8 साल की नंदिनी किसी तरह चूल्हा जोड़कर भात पका लेती है और इसी को दोनों समय खाकर चारों भाई बहन सो जाते है.

पिता सुरेंद्र मिश्र अपने इन चार बच्चों में से दो बच्चे, जय कृष्ण तथा नंदनी को स्कूल भेजते थे. लेकिन लॉकडाउन में स्कूल भी बंद है और पिता के मौत के बाद अब लगता भी नहीं कि स्कूल दोबारा जा पाएंगे.

आसपास के लोग इनकी थोड़ी बहुत मदद कर देते हैं. लेकिन आप समझ सकते हैं कि इस छोटे से मिट्टी के घर में ये नन्हे-मुन्ने कैसे अकेले अपने दिन काटते होंगे?

इन चार भाई-बहनों में सबसे बड़ा 9 साल का जयकिशन है. उससे एक साल से भी छोटी उसकी बहन नंदिनी है. उसकी एक बहन स्वीटी 6 साल की है और सबसे छोटा भाई प्रिंस मात्र 4 साल का है. छोटे प्रिंस को तो यह समझ में भी नहीं आता है कि उसके माँ-बाप कहां चले गए है. वह अपने आप में मुस्कुराता रहता है क्योंकि उसे यह मालूम नहीं कि वह किस हालात से गुजर रहा है. गांव के लोग उनके दूर के रिश्तेदारों से संपर्क कर रहे हैं ताकि कहीं कोई ऐसा मिल जाए जो इन बच्चों का पालनहार बने.

गांव के लोग थोड़ी बहुत इनकी मदद कर देते हैं. फिलहाल इसी से इन लोगों का गुजारा चल रहा है. लेकिन सवाल उठता है कि आखिर यह कब तक चलेगा. जब तक सरकारी स्तर पर इन्हें कुछ मदद नहीं मिलती तब तक इसके भविष्य को संवारा नहीं जा सकता.

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