निर्भया केस – फांसी का फंदा अभी कितनी दूर

पटना / नई दिल्ली (संदीप फिरोजाबादी) | 16 दिसंबर 2012 की वो भयानक रात जब दिल्ली के वसंत विहार में चलती बस में 6 लोगों ने निर्भया के साथ दरिंदगी की थी. आरोपियों की क्रूरता का स्तर इतना ज्यादा था कि निर्भया केस के बारे में सुनकर लोगों की रूह कंपकपा गई थी. डाक्टरों ने निर्भया को बचाने का भरसक प्रयास किया और हालात में सुधार ना होने की वजह से सिंगापुर रैफर किया गया पर लाख कोशिश करने के बाद भी निर्भया को बचाने में असफल रहे.
निर्भया केस के सभी 6 आरोपियों को पकड़ने में पुलिस सफल रही और सभी पर आरोप भी साबित हो गए. जिनमे से एक आरोपी राम सिंह ने जेल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी और एक आरोपी नाबालिग होने की वजह से कड़ी सजा से बच गया था. जुवेनाइल कोर्ट से उसको बस 3 साल की सज़ा हुई  और फिलहाल नाबालिग अपनी सजा पूरी कर रिहा भी हो चुका है. यही वो आरोपी था जिसने निर्भया के साथ सबसे ज्यादा दरिंदगी की थी. बाकी के अन्य चारों आरोपी मुकेश सिंह, विनय शर्मा, अक्षय ठाकुर, पवन गुप्ता पर चली लंबी कानूनी प्रक्रिया के आधार पर निचली अदालत, दिल्ली हाईकोर्ट और अंतिम सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट फांसी की सजा सुना चुका है.
8 साल गुजर जाने के बाद, 1 फरवरी 2020 को फांसी की तारीख निश्चित की गई है. इधर चारों आरोपियों ने सजा से बचने के लिए अपने वकील के माध्यम से ना जाने कितने तिकड़म लगाना शुरू कर दिया है. दया याचिका और चारों के जेल में व्यवहार के आधार पर फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने की भरसक कोशिश में लगे हैं.
कभी कभी न्याय प्रक्रिया की इतनी धीमी रफ्तार को देखकर ऐसा लगता है कि अगर यही हाल रहा तो किसी भी जुर्म करने वाले को सजा का भय ही नहीं रहेगा. निर्भया केस के बाद भी ना जाने कितने और ऐसे ही केस सामने आए. कुछ वक़्त पहले हैदराबाद में वेटनरी डाक्टर से रेप और मर्डर के आरोपियों को पुलिस ने दो हफ्तों के अंदर ही एनकाउंटर में मार गिराया था. जिसके बाद कई संगठन और राजनीति करने वाले सक्रिय हो गए थे. और इस एनकाउंटर पर भी सवाल उठाने लग गए थे.
अब सवाल ये उठता है कि क्या पुलिस के द्वारा उठाया गया ये कदम कानून व्यवस्था के खिलाफ था या आरोपियों को सबक देने के लिए ऐसे ही कदम का उठाया जाना बहुत अनिवार्य है.