भाकपा-माले और राजद गठबंधन के संभावित हश्र की चर्चा सिवान में जोरों पर…

सिवान (वरिष्ठ पत्रकार अनुभव कु सिन्हा की विशेष रिपोर्ट) | वामदलों की राजनीतिक लिप्सा और उनके सिमट के दायरे का बेहतरीन नमूना 17वीं विधानसभा चुनाव में देखने में आ रहा है.

वाम दलों में माकपा और भाकपा अब माइक्रोस्कोपिक माइनॉरिटी बन चुकी हैं. जबकि भाकपा-माले की स्थिति दोनों दलों से बेहतर है और उसने अपना सांगठनिक आधार बढ़ाया भी है. यही वजह है की 17वीं बिहार विधान सभा चुनाव में अपने सहयोगी दलों के साथ वह 19 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. कुल 19 सीटों में से तीन सीटें दरौली, जीरादेई और दरौंदा सिवान जिले में हैं. भाकपा माले की स्थिति पर गौर करने की जरूरत है. इस पार्टी को जितना नुकसान सिवान जिले में उठाना पड़ा उतना और कहीं नहीं. विडंबना देखिए कि राजग के बाहुबली, सांसद रह चुके मोहम्मद शहाबुद्दीन को पहली सजा आजीवन कारावास की हुई जो भाकपा-माले कार्यकर्ता छोटेलाल की हत्या से जुड़ी थी. और, आज उसी पार्टी के साथ उसका चुनावी तालमेल है. हो सकता है सत्ता पाने की चाहत में माले, चंद्रशेखर हत्याकांड को भूल ही जाए क्योंकि कुछ समय से चंद्रशेखर हत्याकांड की चर्चा पार्टी स्तर पर सुनाई नहीं पड़ी है.

भाकपा-माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य का यह पलायन कौतूहल पैदा करता है. सत्ता प्राप्ति की चाहत में सिद्धांतों की तिलांजलि और कार्यकर्ताओं की भावनाओं को तिरस्कृत कर देने का नायाब नमूना है यह बेमेल गठबंधन.

सिवान जिले में भाकपा-माले की मौजूदगी को प्रभावशाली समझा जाता था. जिसने अत्याचारी, निरंकुश और अपराधियों को बढ़ावा देने वाली सत्ता राजद के खिलाफ सतत संघर्ष किया और गरीबों बेवसों का भरोसा हासिल किया था. लेकिन उसी पार्टी के साथ उसके चुनावी तालमेल ने कई सवालों को जन्म दे दिया है.

भाकपा-माले के पूर्व का परिचय आईपीएफ (IPF) का है जो हिंसा में पूरी तरह से यकीन करता था. पर बाद में हिंसा के रास्ते को त्याग कर आईपीएफ का नया चेहरा भाकपा-माले के रूप में सामने आया जिसने लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था जताई और संघर्ष के रास्ते सत्ता तक पहुंचने के मार्ग का चयन किया.

इसलिए सवाल यह है कि राजद से मिले जख्मों का भाकपा-माले के लिए न्यू नॉर्मल क्या है? क्या यह नए तरीके की प्रतिशोधात्मक राजनीति होगी? इस बात का भरोसा कैसे होगा कि अपने लक्ष्य की प्राप्ति में राजद से तालमेल कर भाकपा-माले अपने कार्यकर्ताओं की भावनाओं को आहत नहीं करेगा?

दरौंदा विधानसभा तो पुनर्गठन के बाद 2009 में अस्तित्व में आया. लेकिन दरौली का जहां पौराणिक महत्व है, वही जीरादेई का संबंध देश के पहले राष्ट्रपति देशरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद से है. लेकिन आज का जीरादेई और दरौली विकास से कोसों दूर हैं तो इसकी वजह विचारधारा और उसे स्थापित करने में सत्ता से सतत संघर्ष की कहानी है. किसी भी शासन-प्रशासन के लिए विधि-व्यवस्था पहली शर्त होती है, इसलिए भाकपा-माले और सत्ता के बीच चला संघर्ष एक समय माले का गढ़ रह चुका दरौली उसी की मिसाल है.

हालांकि नीतीश राज में पिछले 15 वर्षों में उन क्षेत्रों में सड़के बनी, आवागमन की सुविधाएं बेहतर तरीके से बहाल हुई, बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित हुई, लेकिन गरीबों के हक और हुकूक की लड़ाई के नाम पर माले ने ऐसा सामाजिक असंतोष पैदा किए रखा जिसका नकारात्मक असर समाज पर ही पड़ा और विकास अवरुद्ध हो गया. इसलिए जब इस पार्टी ने राजद से चुनावी तालमेल किया, तब से सिवान में इसके राजनीतिक पाखंड की चर्चा खूब हो रही है. जिस दौर से माले को सिवान में गुजरना पड़ा और जिस दौर का दबदबा याद कर राजद अपनी मरहम पट्टी करता है, उन दोनों को यदि सत्ता मिल गई तो नए तरीके से सिवान का हश्र क्या होगा… यह प्रश्न ज्यादा कठिन नहीं है.

(उपरोक्त लेखक के अपने विचार हैं)