बाल मजदूरी है अभिशाप

नई दिल्ली (TBN रिपोर्टर) | “बाल मजदूरी अभिशाप है” – दीवारों पर गहरे रंग में उभरे हुये से अक्षरों में लिखा हुआ ऐसा प्रतीत होता है जैसे हमारे देश की सरकार के द्वारा दी गयी कोई चेतावनी है. जिसे देखकर और पढ़कर लोग निकले चले जाते हैं. ये सरकार के किसी जागरूकता अभियान के तहत दीवारों को रंग कर जागरूकता फैलाने के उद्देशय का एक परिणाम मात्र सा ही प्रतीत होता है. दीवारों को रंग कर अगर बाल मजदूरी समाप्त होती तो पता नहीं कब की समाप्त हो चुकी होती. बाल मजदूरी को जड़ से समाप्त करने के लिये सरकार के द्वारा किये गये प्रयासों की सराहना भी करनी चाहिये. सरकार काफी हद तक बाल मजदूरी को समाप्त करने में सफल भी रही है. बहुत सारी NGO भी बाल मजदूरी को समाप्त करने का भरसक प्रयास कर रहीं हैं. सरकार और NGO दोनों ने मिलकर बालमजदूरी जैसी सामाजिक बुराई के विरूद्ध अपनी लड़ाई जारी रखी है.
बाल मजदूरी को रोकने के लिये बहुत सारे कानून भी बनाये गये हैं लेकिन “क्या सरकार और NGO बाल मजदूरी को समाप्त करने के प्रयास में सफल रहे?” इस सवाल का जवाब हमें निशब्द सा कर देता है जब हम देश के हर शहर, गाँव और कस्बों में बाल मजदूरों को आज भी काम करते हुये देखते हैं. आज भी बहुत से कामों में बाल मजदूरों को लगाया जाता है शायद ऐसा इसलिये भी है कि कुछ काम जो सालों से बाल मजदूर आसानी से करते आ रहे हैं. वो काम बाल मजदूरों के द्वारा ही कराये जाते हैं. पीढ़ी दर पीढ़ी एक चलन सा बन गया है. इस सबके लिये कौन जिम्मेदार है हमारा समाज, कुछ सरकारी अधिकारियों का ढीला रवैया या उधोग धंधे वालों के मस्तिष्क में पनपी हुई लालच की जड़ कि एक बाल मजदूर से अपने मनमुताबिक काम कम पैसों में आसानी से कराया जा सकता है या फिर मजदूरी करना बच्चों की मजबूरी बन गया है. बचपन में बिना बुलावे के आयी हुई ज़िम्मेदारी मजबूरी में मजदूरी का रूप ले लेती है.