‘आपरेशन लोटस इन बिहार’ को असफल करने के बाद… क्या नीतीश का आडियो क्लिप मोदी-शाह को करेगा जमींदोज ?

पटना (वरिष्ठ पत्रकार अनुभव सिन्हा की खास रिपोर्ट)| महागठबंधन सरकार (Grand Alliance Government) का नेतृत्व करने वाले नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने अपने एक बयान से केंद्र और विपक्ष दोनों को साधने की मंशा जता दी है. विपक्ष को साधने का आशय एक जुट होने से है और यही वह बड़ी तैयारी भी हो सकती है जिससे केंद्र भी साधा जा सकता है.

नीतीश कुमार के इस बयान ने जबरदस्त सुर्खियों बटोरीं जब उन्होने पूछा, “2014 मे आने वाले 2024 मे रहेंगे क्या ?” हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि इस एक लाइन का वजन जितना हो सकता है, उसी हिसाब से नीतीश कुमार की तैयारी भी है.

आपरेशन लोटस इन बिहार

लेकिन परसेप्शन यह बनाया जा रहा है कि नीतीश कुमार ने बिहार में ‘आपरेशन लोटस’ (Operation Lotus in Bihar) को विफल करने के बाद ही अपना उपरोक्त बयान दिया है. कुछ लोगों का ख्याल यह है कि महागठबंधन (Mahagathbandhan) के मुकाम तक पहुंचने मे नीतीश कुमार को लगभग ढाई महीने लगे. तो कुछ लोग यूपी विधानसभा चुनावों मे नीतीश कुमार की भूमिका से भी इसे जोड़कर देखते हैं.

लेकिन, बड़ा सवाल यह है कि ‘आपरेशन लोटस’ में जदयू के जो तीन बड़े नाम शामिल थे, उनमें से एक का नाम उजागर हो जाने के बाद शेष दो लोगों के प्रति नीतीश कुमार का रवैया कैसा रहता है. और, यह भी कि ये दो बड़े नामधारी आनेवाले समय में किस भूमिका मे नजर आते हैं.

क्योंकि, नरेन्द्र मोदी को टक्कर देने के रास्ते पर निकल पड़े नीतीश कुमार पहले अपना घर ठोक-बजाकर ठीक कर लेना चाहते हैं इसलिए अभी चुप हैं. इस चुप्पी में उस आडियो क्लिप का भी राज छिपा हुआ है जिसका इस्तेमाल मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के काम आयेगा.

जानकारों की माने तो भविष्य में आडियो क्लिप को सार्वजनिक कर नीतीश कुमार जो मैसेज देना चाहते हैं, उसकी टाइमिंग बहुत मायने रखती है. यह सही है कि ऐसा जब भी होगा, तीखा विवाद पैदा हो सकता है. लेकिन इसके लिए जरुरी है कि अपने बेहद मजबूत हो चुके विरोधी भाजपा की हर गतिविधियों की सही जानकारी उन्हें मिलती रहे. यह बहुत आसान इसलिए भी नही है कि भाजपा मे सेंधमारी एक दुरुह प्रयास है.

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जानकार बताते हैं कि भले राजद के साथ जाने के लिए जदयू का फैसला सामूहिक हो, लेकिन 9 अगस्त की बैठक से कुछ महत्वपूर्ण लोग नदारद भी थे जिनमें दो में से एक वह चेहरा भी शामिल है जिनपर नीतीश कुमार को ‘आपरेशन लोटस’ में शामिल होने का संदेह है.

इसलिए यदि यह मानकर चला जाये कि 2024 का लोकसभा चुनाव किसी एक के लिए वाटर लू साबित होगा ही. तब वह सरल निष्कर्ष भी उपलब्ध है कि कमजोर साबित होने पर हार का मुंह देखना पड़ता है.