5 बिहारियों को मिला पद्मभूषण सम्मान, जानिए पूरी जानकारी यहां

पटना (TBN – The Bihar Now रिपोर्ट)| हर वर्ष की भांति इस बार भी गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पद्म विभूषण और पद्म भूषण समेत अन्य अवॉर्ड का ऐलान किया है. इसी कड़ी में बिहार के पाँच हस्तियों को पद्मभूषण से सम्मानित किया गया है. इस बार बिहार से किसी शख्सियत को पद्म विभूषण सम्मान नहीं मिला है.

इस बार पद्मभूषण सम्मान बिहार से पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. रामविलास पासवान और गोवा की राज्यपाल रह चुकी मृदुला सिन्हा को मरणोपरांत दिया गया है. इन दोनों के अलावा रामचंद्र मांझी, दुलारी देवी और डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह को इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.

आइए जानते हैं, इन सबको किस कारण यह पुरस्कार मिला है –

रामचंद्र मांझी

भोजपुरी के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर (Bhikhari Thakur) के शिष्य रामचंद्र माझी (Ramchandra Manjhi) को बिहार की लुप्त होती जा रही कला लौंडा नाच को लेकर देश का यह सम्मान मिला है. दबे कुचले समाज से आनेवाले रामचंद्र मांझी सारण जिले के नगरा, तुजारपुर से आते हैं.

94 वर्षीय मांझी ने 10 साल की उम्र में ही अपने गुरु भिखारी ठाकुर के साथ स्टेज पर थिरकना शुरू कर दिया था. 1971 तक वे भिखारी ठाकुर के साथ ही अपनी कला का प्रदर्शन करते रहे. 1971 में भिखारी ठाकुर के निधन के बाद रामचंद्र मांझी ने शत्रुघ्न ठाकुर, रामदास राही, प्रभुनाथ ठाकुर, गौरीशंकर ठाकुर और दिनकर ठाकुर के साथ अपने काम को आगे बढ़ाया.

क्या है लौंडा नाच (Launda Dance)

बिहार की प्राचीन लोक नृत्यों में से एक है – लौंडा नाच. इस नाच में लड़का, लड़की की तरह मेकअप करके एक महिला की वेशभूषा में डांस करता है. इस डांस का आयोजन किसी भी शुभ मौके पर होता है. इस तरह के नाच का आयोजन आज कुछ ही लोग करवाते हैं. इस कारण वर्तमान समय में लौंडा नाच की कुछ ही मंडलियां बच गई हैं. इससे यह नाच हाशिये पर आ खड़ा हुआ है.

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लोगों की माने तो आज भी इस लौंडा नाच को समाज में काफी पसंद किया जाता है. लेकिन बदलते वक्त ने लोगों के बीच डीजे और ऑर्केस्ट्रा को ज्यादा मशहूर बना डाला है. फिर भी इस नाच के लाखों कद्रदान आज भी हैं. इस नाच की जो भी मंडलियां बची हैं, उनकी हालत अच्छी नहीं है.

मांझी को केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी की तरफ से लोक रंगमंच पुरस्कार भी मिल चुका है. पद्मश्री सम्मान मिलने के बाद रामचंद्र मांझी मानते हैं कि ये पुरस्कार इसी कला की बदौलत उन्हें मिले हैं. इस अवॉर्ड के मिलने से रामचंद्र को उम्मीद है कि अब लौंडा नाच की कला में फिर से नई जान आएगी. उन्हें पद्मश्री अवार्ड मिलने की जानकारी मिलने के बाद से उनके परिजनों एवं जिलावासियों और लोक-कलाकारों में काफी खुशी की लहर है.

दुलारी देवी

54 वर्षीय मल्लाह समाज से आने वाली दुलारी देवी (Dulari Devi) को मिथिला पेंटिंग में उल्लेखनीय कार्य के लिए भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया है. दूसरों के घर में बर्तन मांजना और झाड़ू पोछा का काम करने पर मजबूर दुलारी देवी किसी तरह अपना जीवन निर्वहन करती रही है. राजनगर प्रखंड के एक बेहद गरीब मल्लाह परिवार में जन्मीं दुलारी देवी की 12 साल की उम्र में ही शादी हो गई थी. उसे शादी के महज 7 साल बाद ही अपने नैहर लौट आना पड़ा.

मिथिला पेंटिंग की मशहूर आर्टिस्ट कर्पूरी देवी, जो दुलारी के गांव में ही रहती थी, के घर दुलारी झाड़ू-पोंछा करने का काम करने लगी. वहीं उसने अपने हाथ में कूची पकड़ मधुबनी पेंटिंग बनाना शुरू कर दिया. कर्पूरी देवी के साथ ने दुलारी देवी में छिपे जादुई हुनर को बाहर निकाल दिया. उसकी पेंटिंग की जादू को देखकर पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने दुलारी की तारीफ की थी.

डॉ दिलीप कुमार सिंह

26 जून 1926 को बांका में जन्मे 93 वर्षीय दिलीप कुमार सिंह (Dr. Dilip Kumar Singh) को समाज एवं चिकित्सीय सेवा में बेहतर कार्य के लिए पद्मश्री से नवाजा गया है. वे बिहार के भागलपुर के रहने वाले हैं. डॉ सिंह को 1980 में गरीबों के बीच मुफ्त पोलियो टीका वितरण के लिए लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड में स्थान मिला था. हाईस्कूल की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने 1952 में पीएमसीएच से एमबीबीएस किया. उसके बाद उन्होंने लंदन से डीटीएमएच पास किया. फिर डॉ दिलीप ने कुछ दिनों न्यूयॉर्क में अपनी सेवा दी थी.

अपने देश व शहर वापस आने के बाद वे गांव-गांव जाकर लालटेन की रोशनी में मरीजों का इलाज करते थे. 1980 में देश के वह पहले व्यक्ति बने, जिन्होंने ग्रामीण बच्चों को पोलियो का नि:शुल्क टीकाकरण कराया. इसके लिए उन्होंने अपने पैसों से विदेश से पोलियो का टीका मंगा कर भागलपुर के पीरपैंती में 1013 बच्चों को यह टीका लगाया था. आश्चर्यजनक था कि उस वक्त भारत में पोलियो का टीका उपलब्ध नहीं था. डा. यमुना प्रसाद सिंह सेवा निधि नामक अपने ट्रस्ट से उन्होंने नि:शुल्क टीकाकरण जारी रखा.

इतना ही नहीं, डॉ दिलीप ने 1954 में अपने अस्पताल में कुष्ठ रोग से पीड़ित की रोगियों की भी निःशुल्क इलाज कर ठीक किया था. आज भी डॉ सिंह मरीजों का इलाज करते हैं और गरीबों को मुफ़्त में सेवा देते हैं. डॉ. दिलीप कुमार सिंह के पुत्र संजय सिंह भागलपुर के नामचीन सर्जन में से एक है. उनकी पुत्रवधु प्रतिभा सिंह समेत पौत्र भी डॉक्टर हैं

मृदुला सिन्हा

मृदुला सिन्हा (Mridula Sinha), जिन्हें मरणोपरांत पद्मश्री से सम्मानित किया गया है, ने अगस्त 2014 से अक्टूबर 2019 तक गोवा के राज्यपाल के रूप में कार्य किया था. उन्होंने पिछले साल 18 नवंबर को नई दिल्ली में अंतिम सांस ली. सिन्हा ने जनसंघ के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में मुजफ्फरपुर से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की थी. बाद में उन्हें भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नामित किया गया. लखीसराय में बालिका विद्यापीठ की एक शिष्या, सिन्हा बहुत ही लोकप्रिय थीं और मुख्य रूप से अपनी सादगी के लिए उन्हें जाना जाता था. राजनीतिक के साहित्य सेवी मिथिला सिन्हा को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है.

राम विलास पासवान

32 साल के राजनीतिक जीवन में 9 बार लोकसभा और दो बार राज्य सभा सांसद रहे स्व रामविलस पासवान (Ram Vilas Paswan) को मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान दिया गया है. राज्य के खगड़िया में जन्मे रामविलास पासवान का नाम देश के 6 प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने का रिकॉर्ड दर्ज है. वे 11 बार चुनाव लड़े जिनमें 9 मौकों पर उन्होंने जीत दर्ज की थी. 16वीं लोकसभा में चुनाव नहीं लड़ने के बावजूद वर्तमान मोदी सरकार में वे उपभोक्ता मामलों के मंत्री बनाये गए. गत वर्ष यानि 2020 में 8 अक्तूबर 2020 को बीमारी के कारण उनका निधन हो गया.