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नीतीश-लालू के राजनीतिक जाल से बिहार को बाहर निकालने में सफल हो पायेंगे प्रशांत किशोर ?

पटना (TBN – अनुभव सिन्हा की रिपोर्ट)| भारत (India) की जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था (democratic system) को मजबूत और परिपक्व बताया जाता रहा है, इसका पाखण्ड से भरा हुआ उदाहरण बिहार (Bihar) है. लोकतांत्रिक मजबूती का सिर्फ एक मतलब है और वह है चुनाव !

राजनीतिक दलों ने धीरे-धीरे ऐसी राजनीतिक जाल बिछा दी जिससे निकल पाना मतदाताओं के लिए असम्भव-सा हो चुका है. बल्कि यह कहा जाना चाहिए कि यह सैचुरेशन प्वाइंट पर पहुंच गया है. लोकतांत्रिक अर्थों में सैचुरेशन प्वाइंट सकारात्मक होकर बदलाव में परिवर्तित हो जाता है और संयोग से बिहार परिवर्तन के दौर के मुहाने पर खड़ा नजर आ रहा है.

कैसे आयेगा यह परिवर्तन और इस परिवर्तन के संकेत क्या हैं, इसपर नजर डालने की जरुरत है. इतिहास यही बताता है कि राजनीतिक परिवर्तन के लिए सामाजिक जागरुकता जरुरी है. राजनीतिक दल जिस जागरुकता की दुहाई देते हैं, सामाजिक जागरुकता उससे अलग होती है और तभी राजनीतिक माहौल में परिवर्तन जैसा बडा़ काम सम्भव हो पाता है.

स्थिति चाहे देश भर की हो या उसमें शामिल बिहार की हो, सामाजिक मुद्दे गौण हैं और राजनीति उनकी नियामक बन गई है. जातिवाद, तुष्टीकरण और भ्रष्टाचार के जाल में फंस चुका मतदाता विकल्पहीनता के अभाव में अपने मताधिकार का प्रयोग ही करता आया है, एक अवस्था में रहते-रहते उसकी समस्याएं काफी जटिल हो चुकी हैं.

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यह स्थिति इस बात की परिचायक भी है कि आमलोगों की भौतिक स्थिति में सुधार की छटपटाहट और उनके उपर थोपी गई व्यवस्था के बीच एक गैप है. यह गैप जितना बड़ा होगा, सफलता की सम्भावना उतनी ही ज्यादा होगी.

प्रशांत किशोर (Prashant Kishore) इस गैप को खत्म करना चाहते हैं. दलों के स्थापित तौर-तरीकों से अलग उनकी जन सुराज पदयात्रा का बढ़ता जा रहा कारवां इसकी तस्दीक करता है. वह लोगों से मिल रहे हैं. ग्रामीण इलाकों की वास्तविकता विकास के सरकारी दावों को कहीं भी प्रतिबिम्बित नहीं करती. शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पलायन, किसानों की स्थिति विकास के मानक पर खरे नहीं उतरते.

लेकिन दूसरी तरफ राजनीतिक दलों के बिछाए जातिवाद, राजनीतिक भागीदारी, सेक्यूलरिज्म के नाम पर समाज को बांटने का षडयंत्र जैसे आजमाए हुए नुस्खे के जाल हैं जिनकी बदौलत वह सत्ता सुख भोगते हैं और पूरा समाज अभावग्रस्त होकर छटपटाता रहता है. इस ट्रैप से समाज को बाहर निकालना क्या वाकई सरल है ?

प्रशांत किशोर की अपनी लाईन है. कोई प्रोपेगैंडा नहीं, कोई शोर-शराबा नहीं, कोई प्रचार नहीं बल्कि अपने काम पर विश्वास और विकल्पहीनता को दूर करने के लिए तैयार बैठे आम लोग. किशोर मीडिया से दूर रहते हैं, फिर भी ग्रामीण इलाकों में उनसे मिलने और उनका उद्देश्य जानने के लिए हजारों किलोमीटर की दूरी तय करके पत्रकार आते हैं.

पत्रकारों का दृष्टिकोण भी नयापन नहीं चाहता

यह समझकर हैरत भी होती है कि ऐसे पत्रकारों का दृष्टिकोण भी नयापन देखने की जहमत उठाना नहीं चाहता. दूर-दूर से आने वाले पत्रकार यदि ग्रामीणों से बात करें तब शायद राजनीतिक दलों का फैलाया गया आडम्बर समझना ज्यादा सरल हो सकता है कि उसे दूर करने के लिए सिर्फ संकल्प की जरुरत है !

नीतीश-लालू (Nitish-Lalu) के पिछले 32 वर्षों के ऐसे ही मकड़जाल को काटने का टूल बनकर जन सुराज पदयात्रा (Jan Suraaj Padyatra) सामने आई है. नीतीश-लालू का राजनीतिक स्वांग बिहार में अपने चरम पर पहुंच गया है. राजद-जदयू (RJD-JDU) जैसे क्षेत्रीय दल जब सत्ता पर काबिज होते हैं और उनके पास विकास का कोई वीजन नहीं होता तब, उस राज्य के सम्भावनाओं के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं. यही चरम अवस्था है.

प्रशांत किशोर की जन सुराज पदयात्रा इस चरम से प्रस्थान करती है. पदयात्रा में एक लम्बा समय देने के बाद सामने आया नया समूह राज्य की दशा-दिशा तय करे, यह किशोर के वीजन का हिस्सा है.