समझें परमाणु शक्ति कैसा विनाश कर सकती है…..

यूक्रेन संकट (Ukraine crisis) के उकसावे से यदि अमेरिका और रूस के बीच न्यूक्लियर युद्ध (Nuclear war between America and Russia) छिड़ जाए और दोनों अपनी मौजूदा न्यूक्लियर क्षमता का पूरा इस्तेमाल करें तो दोनों देशों के सभी प्रमुख शहर और औद्योगिक क्षेत्र जलकर राख हो जायेंगे.

रटगर्स यूनिवर्सिटी के पर्यावरणविद् और ख्याति प्राप्त प्रोफेसर एलन रोबोक (Environmentalist and Rutgers University’s eminent Professor Alan Roebuck) ने इस प्रश्न का उत्तर दिया है.

परमाणु युद्ध (nuclear war) के शुरू होने के एक सप्ताह के अंदर 150 मिलियन टन काला धुंआ वातावरण मे प्रवेश करेगा. यह धुंआ उपर उठकर Stratosphere में पहुंचेगा और पूरी पृथ्वी को वर्षों तक ढके रखेगा. काला धुंआ सूर्य की किरणों को अवशोषित कर लेता है जिससे सूर्य की किरणें धरती पर नहीं पहुंच पायेंगी. नतीजतन युद्ध के दो सप्ताह बाद जब काला धुंआ पूरी दुनिया के उपर पसर चुका रहेगा, पृथ्वी अंधेरे और ठंढ से घिर जायेगी.

उपरी वातावरण में धुंआ सूर्य की किरणों को सोखता रहेगा जिससे उपरी वातावरण गर्म होता जायेगा और ओजोन की परत नष्ट हो जायेगी और खतरनाक Ultraviolet (यूवी) किरणें जमीन पर पहुंचने लगेंगी. हालांकि कुछ मात्रा में यूवी किरणों को धुंआ सोख लेगा, फिर भी धरती पर पहुंचने वाली किरणों की मात्रा ज्यादा ही होगी. इसका परिणाम यह होगा कि यूवी किरणों का दुष्प्रभाव डीएनए संरचना पर पड़ेगा जिससे कैंसर की बीमारी बढ़ जायेगी.

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परमाणु युद्ध के दो महीने बाद सभी महाद्वीपों का तापक्रम शुन्य डिग्री से नीचे चला जायेगा और तब Nuclear Winter का मौसम हमारे सामने रहेगा. इस शुन्य डिग्री से नीचे के तापक्रम होने के कारण खेती नहीं हो जायेगी और यह अवस्था वर्षोंं तक बनी रहेगी. ऐसा इसलिए भी होगा क्योंकि सभी महाद्वीपों में वर्षा का क्रम भी अवरूद्ध हो जायेगा तथा अत्याधिक ठंढ होने के कारण बर्फबारी भी होगी जिसकी वजह से खेती नहीं हो जायेगी.

युद्ध के चार महीने बाद खाद्य सामग्रियों के समाप्त होते जाने की वजह से भुखमरी की स्थिति पैदा होने लगेगी. ठंढ और अंधेरे की स्थिति होने की वजह से वर्षों तक खेती नहीं हो पायेगी.

युद्ध के दो वर्ष बाद धरती पर अधिकांश लोग भूख की वजह से दम तोड़ चुके रहेंगे. तटवर्ती क्षेत्रों में ही कुछ लोग जीवित बचे रहेंगे जिनका जीवन शिकार और मछलियों की वजह से बचा रहेगा. फिर भी ठंढ, अंधेरा और विकिरण के दुष्प्रभावों से ये लोग भी बच नहीं पायेंगे.

दक्षिणी गोलार्ध मे जीवित बचे लोगों की संख्या काफी कम रहेगी क्योंकि वे लोग बमों से काफी दूर होंगे. हालांकि उन्हें गर्म समुद्र का सामना करना पड़ेगा जिससे ठंढ मे कमी आयेगी. चार वर्ष बाद तापक्रम में वृद्धि होगी परंतु यह वृद्धि युद्ध पूर्व जैसी स्थिति में अगले बीस वर्षों तक नहीं आयेगी. इस दौरान वर्षा भी होनी शुरू हो जायेगी. लेकिन युद्ध पांच वर्ष बाद भी कैंसर की बीमारी में वृद्धि बढ़ती ही जायेगी.

विकिरण के असर से वनस्पतियां भी अछूती नहीं रहेंगी. प्रकृति को सामान्य रूप से पूर्ववत स्थिति मे लौटने में दस साल लग जायेंगे. अगले बीस वर्ष बाद जीवित बचे लोगों को रेडियोएक्टिव इलाकों से दूर ही रहना होगा.

अमेरिका और रूस के पास मौजूद 4000 परमाणु अस्त्रों की वजह से यह सब हो सकता है. यहां तक कि यदि परमाणु अस्त्रों से सम्पन्न 9 देशों में से किसी एक देश ने भी सिर्फ 100 परमाणु अस्त्रों का ही प्रयोग कर दिया तब अभी तक के मानव इतिहास में अभूतपूर्व ढंग से पर्यावरणीय परिवर्तन हो जायेगा.

(लेखक – वरिष्ठ पत्रकार अनुभव सिन्हा की कलम से)