बिहार का ऐतिहासिक देववरूणार्क सूर्यमंदिर बदहाल स्थिति में

पटना (The Bihar Now – रवि संगम की खास व इक्स्क्लूसिव रिपोर्ट)। वर्तमान में पर्यटन, बिहार में सबसे बड़ा राजस्व प्राप्त करने वाला क्षेत्र हैं. राज्य सरकार कुछ चिन्हित पर्यटक स्थलों के भरोसे लंबे समय से आत्ममुग्ध है. राज्य में पर्यटन के संपूर्ण विकास के लिए न कोई विजन है, न रिसर्च है, न कोई कार्ययोजना और न सार्थक कार्य. इसका स्पष्ट प्रमाण है – अभी हाल में ही पटना स्थित दो म्युजियम को जोड़ने के लिए 300 करोड़ खर्च कर भूमिगत टनल (सुरंग) बनाने की सरकारी योजना, जो कि खबर सुर्खियों में रही है.

लेकिन पहले से स्थापित पौराणिक, ऐतिहासिक महत्व के पर्यटक स्थलों के विकास की कोई कार्ययोजना नहीं है. देश के 12 पौराणिक सूर्यमंदिरों में से एक, बिहार में स्थित देववरूणार्क सूर्यमंदिर (Deo Barunark Sun Temple) वर्षों से बदहाल स्थिति में है. सरकारी सोच के दिवालियापन का स्पस्ट उदाहरण है – यह सूर्यमंदिर.

दुखद पहलू है यह

दुखद है कि ऐसे सैकड़ों स्थलों से मीडिया जगत भी अनभिज्ञ है. अगर इसका जीर्णोंद्धार हो तो यह राष्ट्रीय स्तर का विशिष्ट पर्यटक स्थल बन सकता है. इसको समझने के लिए इस प्राचीन मंदिर के अतीत व महत्ता को समझना होगा.

भोजपुर जिला मुख्यालय से 53 कि.मी. पश्चिम, आरा से दक्षिण (भाया पीरो से तरारी), जिला के पश्चिम सीमा से सटा, प्रखंड तरारी, थाना-सिकरहट्टा कला के देववरुणार्क गांव स्थित (यह तरारी प्रखंड का सबसे बड़ा गांव है).

इस स्थल पर स्थित इस पौराणिक सूर्यमंदिर का विशिष्ट धार्मिक महत्त्व है. इस मंदिर को ‘देववरुणार्क’ के नाम से भी जाना जाता है. मंदिर की स्थिति जीर्ण-शीर्ण है. मंदिर का निर्माणकाल गुप्तकालीन (4थी-6ठी सदी) माना जाता है. मंदिर के बाहर बलुए पत्थर से बने उत्तर गुप्तकालीन (6ठी-7वीं सदी) मंदिर में दुर्लभ सूर्यमूर्ति स्थापित है. ऐसी मूर्ति विरले ही मिलती है. इस मूर्ति की लंबाई 28.5 से.मी. व व्यास 56 से.मी. है.

इस स्थल से उत्खनन में चतुर्भुज विष्णु, शिव, देवी पार्वती , काली आदि कई देवी -देवताओं की मूर्तियां मिली हैं. जिनमें से कुछ गांव में ही यत्र-तत्र पूजित हैं.

रवि संगम

यहां मिले शिलालेख के अनुसार , गुप्तकाल (275 सदी – 550 सदी ई.) में राजा विष्णुगुप्त व उनकी रानी लज्जादेवी के पुत्र विष्णुगुप्त चंद्रादित्य के शासनकाल (540 सदी -550 सदी ई.) के दौरान इस स्थल का विकास हुआ था. राजा विष्णुगुप्त चंद्रादित्य को गुप्तकालीन अंतिम राजा के रूप में जाना जाता है. इस स्थान पर स्थित सूर्यमंदिर के लिए गुप्तकाल व मौखरी वंश ने भूमि प्रदान किया था.

इस प्राचीन स्थल पर स्थित देववरूणार्क गांव को मौर्यकालीन (324 ई. पूर्व – 187 ई. पूर्व) का माना गया है. इस स्थल पर स्थित सूर्यमंदिर का हेनरी बेली वाडे गैरिक द्वारा खिंचा गया मंदिर एवं यहां स्थित तालाब – जो अब लुप्त हो चुका है – का फोटो (1881-82 ई.) इसकी प्राचीनता का साक्ष्य है. इस स्थल के पर्याप्त संरक्षण व विकास की आवश्यकता है.

हेनरी बेली वाडे गैरिक का फोटो ( 1881-82 ई.)

पौराणिक महत्ता

धार्मिक आस्था है कि भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी जाम्बवती (भगवान राम के सेनापति जाम्बवंत की पुत्री) के पुत्र साम्ब ने इसे स्थापित करवाया था. कथा है कि एक समय राजा साम्ब को कुष्ट रोग हो गया था. तब भगवान कृष्ण की प्रेरणा से साम्ब ने सूर्य की आराधना की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान सूर्य के दर्शन हुए. उन्हीं की प्रेरणा से साम्ब ने देश के 12 स्थानों पर सूर्यमंदिर बनवाए – तब उन्हें कुष्ठ रोग से मुक्ति मिली. उन्हीं 12 मंदिरों में से देववरूणार्क मंदिर एक है. यह कथा ‘साम्ब.पुराण’ में मिलती है.

इस भूभाग का ऐतिहासिक महत्त्व

महाभारत काल में इस भूभाग का नाम एकचक्रापुरी था. महाभारत में आदिपर्व के अनुसार पांडवों ने लाक्षागृह से बच निकलने के बाद इसी स्थान पर एक ब्राह्मण का अतिथि बनकर निवास किया था और राक्षस बकासुर का वध किया था – जो प्रतिदिन गांव के एक व्यक्ति को खा जाता था. माता कुंती के आदेश पर भीमदेव से उस राक्षस को मारकर लोगों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी. इस पूरे भूभाग से उत्तर गुप्तकालीन (6ठी-7वीं सदी) कई प्रमाण मिले हैं , जिसमें मुख्यतः हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां प्रमुख हैं.

प्राचीन काशी व मगध जनपद के बीच स्थित इस भूभाग का गौरवशाली इतिहास रहा है. माना जाता है कि इसी काल में यहां एक विशाल गढ़ था , जहां राजा मयूरध्वज का शासन था. उसकी सीमा का विस्तार – वर्तमान में गोपाली चौक टाउन थाना – बांसगोला, कचहरी से गांगी तक था और इसका प्रवेशद्वार नेमकहट्टी में था.

पटना के निकट स्थित इस स्थल के बारे में जैन धर्मावलंबियों का मानना है कि यहां जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने निवास किया था. यहां 14वीं सदी के तीर्थंकर पार्श्वनाथ की मूर्ति जैन मंदिर में स्थापित है. पूरे राज्य में भोजपुर बड़ी संख्या में जैन मंदिरों का एकमात्र सबसे बड़ा स्थल है. इस स्थल को 18 दिसंबर 1972 को जिला का दर्जा मिला.
(कंटेन्टकॉपीराइट – लेखक)