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राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार का मैसेज देने में कामयाब हो रहे हैं प्रशांत किशोर

पटना (TBN – वरिष्ठ पत्रकार अनुभव सिन्हा की रिपोर्ट)| प्रशांत किशोर (Prashant Kishore) का मैसेज कामयाबी के मुकाम पर पहुंच चुके बिहार के राजनीतिक दलों के लिए नया है या बिहारवासियों (Biharies) के लिए ? हो सकता है भ्रष्टाचार की पर्याय बिहार की मौजूदा सरकार या बिहार का मेहनती, शिक्षित और शहरी तबका दोनों ने “व्यवस्था परिवर्तन” को असम्भव मान लिया हो अथवा किसी नए प्रयोग में रूचि न रखते हों, तो उन्हें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि लोकतंत्र में सत्ता की प्राप्ति संख्या के खेल से ही निर्धारित होती है. ऐजेंडा चलाने वाले दल भाषण और आरोप-प्रत्यारोप के जरिए लोगों से जो कुछ भी कहते हैं, उसमें दलों की प्राथमिकताएं ही होती हैं, जनता की भावना और उनकी आवश्यकताएं शामिल नहीं होती.

तो क्या प्रशांत किशोर ने इस नब्ज को पहचान लिया है ?

अपनी जन सुराज पदयात्रा (Jan Suraaj Padyatra) में प्रशांत किशोर की बातों पर बजने वाली तालियों का मतलब पक्ष-विपक्ष और शहरी तबके को अभी नजर नहीं आ रहा है, यदि यह कहा जाए तो भावनाओं की बाजीगरी और बाजारीकरण के लिहाज से कम-से-कम बिहार के सभी राजनीतिक दल पीछे नजर आ रहे हैं. उपेक्षा, गैर-जिम्मेदारी और मक्कारीसे भरी राजनीति में रम चुकी बिहार की सरकार को बिहारवासी क्या सचमुच कोई चुनौती दे ही नहीं सकते ?

बिहार की चर्चा खासकर इसलिए कि बड़े ही ठोस तरीके से यहां एक प्रयोग हो रहा है जो सूबे के राजनीतिक दलों के लिए ताबूत की आखिरी कील साबित हो सकता है. सर के बल चल रहे लोकतंत्र को उसके पांव पर खड़ा करने के प्रयोग की प्रमाणिकता 2025 के विधान सभा चुनावों में सिद्ध होने वाली है.

अगर यह भी मान लिया जाए कि प्रशांत किशोर बिहार की अशिक्षित और ग्रामीण आबादी को जागरूक कर रहे हैं जिनका लक्ष्य अभी “दिल्ली दूर है” जैसा नजर आता हो तब राजधानी में डिप्टी सीएम के रूप में क्या दिखाई देता है ?

लोग भ्रष्टाचार से वाकिफ हैं. नेता हों या हुक्मरान, लोग उनकी तरफ देखते हैं. ये दोनों, लोगों की तरफ नहीं देखते. यह उल्टी गंगा है, लोगों को इससे मतलब नहीं है. लोग समझते हैं कि भ्रष्टाचार रोकना उनका काम नहीं है. उनका काम है हुक्मरानो को सलाम बजाना और भाजपा, राजद, जदयू, कांग्रेस, वामदल के उम्मीदवारों को या फिर यदि कोई निर्दलीय उम्मीदवार हो तो उनमे से किसी एक को चुनाव जिता देने के लिए मतदान करना. इससे ज्यादा उन्हें कुछ समझना नहीं है. क्योंकि सभी दलों ने जाति, मजहब, अगड़े-पिछड़े-दलित, बाहुबल, धनबल के आधार पर मतदाताओं को यह समझा दिया है कि उनके पास कोई विकल्प नहीं है. हुक्मरानो को सलाम नहीं बजायेंगे तो उनका कोई काम नहीं होगा !

राजनीतिक दलों के जो भी आका हैं, उनका भी संदेश स्पष्ट होता है. आप बस मतदान कर दीजिए. सरकार कैसी होगी और आपका कितना ध्यान रखेगी, यह सोचने का काम आपका नहीं. यानी आप कर्म कीजिए, फल के बारे में मत सोचिए और हमें यानी सरकार को कर्मकाण्ड करते रहने दीजिए.

अब, उस प्रयोग पर गौर कीजिए जो बिहार में चल रहा है. किसान के खेत कैसे हैं, खेतों तक पानी पहुंचता है या नहीं, फसलों के लिए जरुरी खाद किसानों को मिल रहे हैं या नहीं, फसलों की उचित कीमत किसानों को मिल रही है या नहीं, एक-एक किसान गवाही दे रहा है कि उसे सरकार से कोई मदद नहीं मिलती ! गांव का युवा मजदूरी करने दूसरे राज्यों का रूख कर लेता है. स्कूलों में बच्चों को शिक्षा मिलने के बजाय उनको मिलने वाले मीड-डे मील की किस तरह लूट-खसोट हो सकती है, नजर इस पर रहती है. अस्पताल में डाक्टर और दवाएं हैं या नहीं, इसकी पड़ताल सरकार नहीं करती. सड़क ठीक है या उसपर लालू राज का ही ठप्पा लगा है, बिजली है तो बढ़े बिल न दे पाने कारण कितने घरों में कनेक्शन काट दिए गए, इसकी पड़ताल नहीं होती. पर बिहार सरकार कहती है कि विकास हो रहा है.

दरअसल, बेरोजगार युवा शक्ति और साधनहींन करोड़ों किसानों की जिम्मेदारी सरकार बोझ के भाव से ही उठाती है. उनके लिए भरोसा, विश्वास और आदर जैसी उर्जा प्रदान करने वाले कारक सरकार की रीढ़ की हड्डी में कंपकंपी पैदा करते हैं. और इसलिए जातिवाद, अगड़ा-पिछड़ा-दलित, समाज को बांटने वाली नीतियों, हिन्दू-मुसलमान जैसे कारकों को ही सरकार आगे बढ़ती है और यह यकीन दिला दिया है कि इसमें बदलाव की जगह कहां है !!?

एक आंकड़े पर नजर डालिए. बिहार में 3 करोड़ परिवार हैं. पर सिर्फ 1250 परिवार के सदस्य ही बिहार की राजनीति के कर्ता-धर्ता हैं. शेष परिवार के लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं, समर्थक हैं या अराजनीतिक हैं. क्या सरकार ने कभी यह आंकड़ा पेश किया ?

ऐसे अनेकों सवाल हैं जिनका जवाब दिया जाना कभी भी जरूरी नहीं समझा गया. अपनी पदयात्रा में लोगों से संवाद स्थापित करते हुए प्रशांत किशोर ऐसे मुद्दों का संकलन करते जा रहे हैं और मीडिया के जरिए लोगों तक तथ्यों को पहुंचा भी रहे हैं. अभी वह पूर्वी चम्पारण के ग्रामीण इलाकों में पदयात्रा पर हैं. ये ग्रामीण इलाके अभी जिस स्थिति में हैं, सुनियोजित तरीके से यदि उनका विकास किया जाए तब कम-से-कम दस साल लगेंगे. और सरकार है कि विकास की बात कहते थकती नहीं है.