भाजपा की पिच पर बैटिंग के लिए मजबूर क्यों है महागठबंधन सरकार ?

पटना (TBN – वरिष्ठ पत्रकार अनुभव सिन्हा की रिपोर्ट)| बिहार की राजनीति (Politics o Bihar) में गजब की लहर पैदा करने के प्रयास हो रहे हैं. जदयू (JDU) के नेतृत्व में महागठबंधन (Grand Alliance) की सरकार है, लेकिन कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार (Nitish Kumar) मुखौटा भर हैं. जदयू के लिए राजद (RJD) की यह आंच बढ़ती जा रही है. तो, अपनी खीझ भाजपा पर उतारते हुए जदयू बिहार इकाई को अत्यंत कमजोर बता रहा है और सीधा केन्द्रीय नेतृत्व को ही चुनौती दे रहा है.

यह बहुत दिलचस्प है कि बिहार में सरकार महागठबंधन की है लेकिन रणनीति तैयार करने का जिम्मा जदयू अध्यक्ष ललन सिंह (JDU President Lalan Singh) पर है. केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Union Home Minister Amit Shah) दो दिवसीय सीमांचल (Seemanchal) दौरे पर शुक्रवार को पूर्णिया (Purnea) आयेंगे. इससे राजद और जदयू दोनों के कान खड़े हो गए हैं. इलाके की अहमियत देखते हुए ललन सिंह ने घोषणा की है कि महागठबंधन भी सीमांचल में रैली का आयोजन करेगा. यह आयोजन भाजपा की रैली के बाद होगा. कदम-कदम पर भाजपा का पीछा करने के लिए जदयू पीछे ही बना रहेगा.

जबकि, महागठबंधन सरकार बनने के बाद बड़ी योजना यह थी कि सभी सात दलों से मिलकर बना प्रतिनिधि मण्डल पूरे सूबे का दौरा करेगा और हर गांव में जाकर नीतीश कुमार के फैसले के बारे में लोगों को बतायेगा. फिलहाल इसकी कोई चर्चा नहीं है. चर्चा जिस बात की हो रही है वह यह है कि राजद कार्यकर्ता सरकार बनने से बहुत खुश हैं. पर, ऐसा ही उत्साह जदयू कार्यकर्ताओं में नहीं देखा जा रहा है.

यह भी पढ़ें| शराब माफिया को गिरफ्तार करने गई पुलिस टीम पर हमला, थानाध्यक्ष सहित 5 पुलिसकर्मी घायल

जदयू की लाईन यह है कि अपनी रैली के जरिए भाजपा सूबे को साम्प्रदायिक रुप से संवेदनशील बनाने की हर मुमकिन कोशिश करेगी. इसलिए महागठबंधन की रैली साम्प्रदायिक सौहार्द्र और सामाजिक एकता बनाए रखने के लिए आयोजित होगी.

उल्लेखनीय है कि सीमांचल एक पिछड़ा इलाका है जिसका राजनीतिक इस्तेमाल होता आया है, पर इलाके की बेहतरी के लिए कुछ ठोस करने के बजाय इसे उपेक्षित रखा गया. रोहिंग्या (Rohingya) और बांग्लादेशी घुसपैठियों (Bangladeshi Infiltrators) की वजह से यहां हो रहे डेमोग्राफिक चेंज में सुधार के लिए लालू और नीतीश कुमार ने कभी कोई कदम नहीं उठाया.

अब जबकि भाजपा के साथ नीतीश कुमार के रिश्ते तल्ख हैं, तब सीमांचल के जरिए ध्रुवीकरण का आरोप वह भाजपा पर लगा सकती है, जबकि भाजपा की नजर दलित मुसलमानों (Dalit Muslims) के बड़े वर्ग पर है जिसे वह विकास की मुख्य धारा में लाना चाहती है.

इस लिहाज से अमित शाह के बाद सीमांचल में महागठबंधन की रैली अपनी राजनीतिक पकड़ को बनाए रखने की हो सकती है जबकि भाजपा की कोशिश मुसलमानों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने की है.

सीमांचल में जदयू कमजोर

वैसे पार्टी स्तर पर देखा जाए तो जदयू की स्थिति सीमांचल में कभी अच्छी नहीं रही. राजद ने इसका राजनीतिक इस्तेमाल जरूर किया पर इलाके की अहमियत को देखते हुए कोई प्रभावी कदम कभी नहीं उठाए गए. यही वजह है कि यह क्षेत्र पिछड़ा है और अन्तर्राष्ट्रीय घुसपैठ का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बनता गया है.

बीते अगस्त महीने में हुए राजनीतिक प्रयोग के बाद बिहार के सीमांचल इलाके में राजनीतिक गतिविधियां बढ़ने वाली हैं जिसे देखना दिलचस्प होगा.