सभी विधायकों के बीजेपी में जाने के बाद क्या है VIP की संवैधानिक स्थिति ?

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पटना (TBN – The Bihar Now डेस्क)| बिहार में मुकेश सहनी की पार्टी विकासशील इंसान पार्टी (Vikassheel Insaan Party) को एक के बाद एक झटका लग रहा है और उसने खुद के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया है. मुकेश सहनी की बीजेपी से दूरी बढ़ने के बाद, बीजेपी (Bhartiya Janta Party) ने उनके तीनों विधायकों को अपने पक्ष में कर पार्टी खाली कर दी.

अब सभी विधायकों को भाजपा में शामिल करने के बाद मुकेश सहनी को भी कैबिनेट से बेदखल कर दिया गया है और सदन में पार्टी की स्थिति लगभग शून्य हो गई है. हालांकि मुकेश सहनी खुद इस समय विधान परिषद (MLC Mukesh Sahni) के सदस्य बने हुए हैं, उन्हें खुद यह नहीं पता कि जुलाई के बाद उनका क्या होगा.

दरअसल मुकेश सहनी का कार्यकाल जुलाई तक बचा है. वीआईपी (VIP) पार्टी के सभी विधायकों के बीजेपी में विलय के बाद इस बात की चर्चा है कि पार्टी का संवैधानिक पद बचा है या नहीं.

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वीआईपी पार्टी के सभी विधायकों के बीजेपी में शामिल होने के बाद भले ही पार्टी सदन में खाली हो गई हो, लेकिन जानकारों के मुताबिक वीआईपी पार्टी की कमान अभी भी मुकेश सहनी के हाथ में है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते, मुकेश सहनी को अभी भी वीआईपी पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह का उपयोग करने का अधिकार है.

सहनी के हाथ में कमान

जानकारों के मुताबिक जब से वीआईपी पार्टी के तीन विधायक राजू सिंह, मिश्री लाल यादव और स्वर्ण सिंह सदस्यता लेकर भाजपा में शामिल हुए हैं, पार्टी की संवैधानिक स्थिति कोई मायने नहीं रखती. दल-बदल विरोधी कानून के तहत दो-तिहाई सदस्यों को किसी अन्य पार्टी में शामिल होना आवश्यक है, जिसके तहत तीनों विधायक शामिल हुए.

इधर, पार्टी के तीनों विधायकों ने अलग गुट का दावा किए बिना भाजपा में शामिल होने का फैसला किया, इसलिए वीआईपी पार्टी की कमान मुकेश सहनी के हाथ में रहेगी.

पार्टी के सभी विधायकों के भाजपा में शामिल होने और मंत्री पद से हटाए जाने के बाद अब मुकेश सहनी ने एक बार फिर लोगों के बीच जाकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है.

मुकेश सहनी का राजनीतिक सफर बहुत कम समय में कई उतार-चढ़ावों का रहा. कुछ ही समय में वे फर्श से अर्श पर पहुंच गए और फिर फर्श पर गिर गए. एनडीए में शामिल होने के बाद पहले गठबंधन में शामिल हुए सीटों के बंटवारे पर नाराजगी जताते हुए गठबंधन ने एनडीए से नाता तोड़ लिया और विधानसभा चुनाव में 4 सीटें पाकर मंत्री बने, लेकिन दो साल के अंदर ही एनडीए में गतिरोध शुरू हो गया और वीआईपी अब बिना विधायक वाली पार्टी बन गई है.