तेजस्वी यादव की कहानी : अधजल गगरी छलकत जाए

पटना (वरिष्ठ पत्रकार अनुभव कुमार सिन्हा की रिपोर्ट)| बिहार विधानसभा के चालू बजट सत्र के पहले हफ्ते के आखिरी दिन (शुक्रवार) को छिपाते-छिपाते भी राजद की कसक सदन के सामने आ गई. दस साल के बाद 2015 में राजद को सत्ता मिली थी, लेकिन अपने दम वह ऐसा नहीं कर पाया था. एक मजबूत चेहरे, नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के सहारे राजद को सत्ता की भागीदारी मिली. पर राजद के लिए इसे पचा पाना आसान नहीं था. क्योंकि जल्द ही राजद की तरफ से ऐसे बयान आने शुरू हो गए थे जो लालू यादव (Lau Prasad Yadav RJD) की छत्रछाया में नीतीश कुमार के राजनीतिक निखार और बिहार की बेहतरी के लिए जरूरी बताया गया था.

जबकि, राजद के ऐसे बड़बोलेपन से अलग उसकी पृष्ठभूमि में दो साल पहले एक बड़ा गुणात्मक परिवर्तन आ चुका था. 2013 में लालू यादव का एक नया इतिहास बना, जब गरीबों का यह मसीहा वोट देने और चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित हो गया. ऐसा हुआ चारा घोटाले में लालू यादव को मिली पहली सजा की वजह से.

लेकिन धन्य है हमारा लोकतंत्र और इसकी रीढ़विहिन नियामक संस्था चुनाव आयोग (Election Commission) जो कानून के मुताबिक एक सजायाफ्ता को वोटिंग राइट और चुनाव लड़ने से वंचित कर देने में तो समर्थ है पर, यदि ऐसा कोई अपराधी किसी राजनीतिक दल (क्षेत्रीय) का राष्ट्रीय अध्यक्ष हो तो, आयोग उसे पार्टी चलाने से रोक नहीं सकता, क्योंकि यह विशुद्ध रूप से राजनीतिक मसला है पीआर ऐक्ट में ऐसी किसी संभावना या आशंका का जिक्र तक नहीं है.

अब सूरत यह है कि मुकदमा चलने के दौरान जब लालू यादव ने सरकार चला कर दिखा दिया तब सजायाफ्ता हो जाने के बाद पार्टी चलाने से कौन रोक सकता है ? शायद अदालत ने भी इस बिन्दु पर अपने स्तर से संज्ञान न लेना ही बेहतर समझा है.

इसलिए लालू जब पार्टी चलाएंगे तब राजद की राजनीतिक शैली में क्या बदलाव होगा और लालू पुत्र तथा प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव जिस बिहार को बदल देने का सपना दिखा रहे हैं वह लालू-राबड़ी के “जंगल राज” से कितना अलग होगा ?

लेकिन स्थिति देखिए, विधान सभा में सदन के नेता यानी मुख्यमंत्री के नेतृत्व में चल रही सरकार और उसकी कार्यशैली पर नेता प्रतिपक्ष ने किस तरह से कटाक्ष किया एक कहानी सुनाकर. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक राजनीतिक निर्णय के तहत 2015 में राजद के साथ मिलकर सरकार बनाई, यह कानूनन कोई अपराध नहीं था. लेकिन जब “रेल घोटाला” में तेजस्वी का नाम आ गया, तब वह कानून की नजर में अपराध था और तब नीतीश कुमार ने दोनों पिता-पुत्र को स्थिति को बिगड़ने से बचाने मौका दिया, लेकिन लालू यादव को यह मंजूर नहीं था कि महज आरोप लग जाने की वजह से तेजस्वी त्यागपत्र दें. लालू ने तो जेल से सरकार चलाई थी. एक बाप अपने बेटे से इतनी बड़ी कुर्बानी कैसे ले सकता था ? लेकिन यहीं पर लालू गच्चा खा गए क्योंकि उनको अनुमान ही नहीं था कि नीतीश कुमार अपने चेहरे पर कोई दाग नहीं लगने देंगे. नतीजा यह हुआ कि नीतीश कुमार ने राजद को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया. उसकी कसक तब और बढ़ गई जब 2020 के विधानसभा चुनाव परिणाम सामने आए. यह राजद के लिए “एक तो नीम दूजे उपर चढ़ा करेला” वाली कहावत को चरितार्थ करने वाला है.

अपनी कहानी को दमदार बनाना तेजस्वी यादव (Tejaswi Yadav) के लिए सम्भव ही नहीं था. उनकी कहानी का 5.15 मिनट का औडियो यूट्यूब पर उपलब्ध है. कोई भी सुन सकता है. कहानी खत्म कर तेजस्वी यादव ने “Contrasting Ideology” और “Contrasting Character” का सवाल उठाया है. ऐसा लगता है पूरा लालू परिवार यह भूल चुका है कि लालू के दोनों लाल जमानत पर हैं और यह जमानत आजीवन नहीं है. राजद की Contrasting Ideology और Contrasting Character की स्थाई विशेषता यह है कि तेजस्वी यादव ने एक पढ़े-लिखे व्यक्ति की तरह बात की जबकि वह स्वयं अर्द्धशिक्षित हैं इसलिए उनकी बातों में मौलिकता कम बनावट ही ज्यादा नजर आती है.

(नोट: उपरोक्त लेखक के निजी विचार हैं)