अब पीके सिंड्रोम की चर्चा नवम्बर तक बिहार में पसरी रहेगी

काँग्रेस पार्टी के प्रति मतदाताओं का नज़रिया, दिल्ली विधान सभा चुनाव परिणामों की चंद विशेषताओं में से एक है. हालांकि परिणामों की व्याख्या परम्परागत ही है. डूबते सूरज की पूजा नही होती , यानी शून्य पर आउट होने के बाद, चुनावी विश्लेषणों में कांग्रेस पार्टी अब महज एक दो लाइनों में सिमट कर रह गयी है.
अरविंद केजरीवाल की जीत का जायका कई गुना बढ़ गया है क्योंकि एग्जिट पोल परिणामों को झूठलाने की पुरजोर कोशिश की गई थी जिसने सभी को सकते में डाल दिया था.
बहरहाल , भाजपा ने 2015 से थोड़ा बेहतर भले किया हो, प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते मनोज तिवारी जैसा दावा और आत्मविश्वाश आने वाले समय मे पार्टी के लिए हानिकारक ही हो सकता है. सब जानते हैं मनोज तिवारी ने कैसा दावा किया था. ” 48 सीटें जीतकर भाजपा दिल्ली में सरकार बनाएगी. इस आशय के ट्वीट को उन्होंने विरोधियों को सम्भाल कर रखने के लिए भी कहा था.”
ऐसा बड़बोलापन उस पार्टी के लिए किसी भी रूप में अनुकूल नही कहा जा सकता जिस पार्टी ने सच्चे अर्थों में देश मे जारी “लोकतांत्रिक व्यक्तिवाद” को करारी चोट पहुंचाई हो और दशकों पुरानी छवि को वैश्विक स्तर पर गतिमान, लोकतांत्रिक एवं जीवंतता के साथ पेश किया हो.
भाजपा इस चुनाव का विश्लेषण करेगी. 2018 के मध्य के बाद से यह उसकी सातवीं बड़ी हार है. लेकिन, इस चुनाव के बाद तीसरी बार दिल्ली के सीएम बनने वाले अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी की हैसियत में कितना इज़ाफ़ा हो सकता है इसका आकलन इस बात से होना चाहिए कि उनकी जीत के लिए उत्तरदायी कारक कैसे हैं.
दिल्ली सहित पूरा देश यह नही भूल सकता कि केजरीवाल सियासी जरूरत के मुताबिक देश विरोधी ताकतों के साथ खड़े होने में कांग्रेस पार्टी को पीछे छोड़ देने के रूप में भी जाने जाते हैं. उनकी जीत में इस मिज़ाज़ का बहुत बड़ा रोल है. यह मिज़ाज़ इस बात की इजाज़त नही देता जैसा उनके पार्टी प्रवक्ता अब कह रहे हैं. जीत के बाद कुछ बड़े बोल और केजरीवाल की खुशामद में कशीदे गढ़ने से ज्यादा यह कुछ है भी नही.
फिर प्रशांत किशोर जैसे लोग भी हैं. परिणाम आने के बाद केजरीवाल के साथ उनकी एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. अब फरवरी से लेकर नवम्बर के बीच कोई चुनाव नही है सिवाय बिहार विधान सभा चुनावों के. इसलिए दिल्ली चुनाव परिणाम और पीके सिंड्रोम की चर्चा नवम्बर तक बिहार में पसरी रहेगी. सीएए, एनपीआर और एनआरसी पर नीतीश सरकार के स्टैंड से बिहार का अल्पसंख्यक नाराज़ बताया जा रहा है. उसकी नाराज़गी इस बात से और चोखा हो जाती है कि नीतीश कुमार भाजपा का साथ दे रहे हैं. नीतीश कुमार के साथ अब राजनीतिक रूप से छत्तीस के सम्बंध की वजह से पीके का रणनीतिक तड़का कितनी झांस पैदा करता है, यह देखना भी दिलचस्प होगा.
लेकिन क्या दिल्ली चुनाव परिणामों ने बिहार में राजद और कांग्रेस की राह आसान बनाई है और, अगर दिल्ली विधान सभा चुनाव में पीके की रणनीति ही काम आयी जैसे सवाल हैं, तो न सिर्फ ऐसे सवाल अहमियत रखते हैं बल्कि ऐसे सवालों के जवाब को परवान चढ़ने में समय लगेगा, यह भी सच है।
(अनुभव सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार की कलम से; ये लेखक के अपने विचार हैं)