राजद को लालू का सहारा….. इसका मतलब क्या ?

पटना (TBN – The Bihar Now डेस्क) | भूख, अशिक्षा, फूहड़पन और रंगदारी ही राजद की असल पहचान है या सचमुच राजद गरीब-गुरबों के चेहरे पर खुशहाली देखने के लिए बेचैन रहता रहता है?

चुनाव के समय में इस कठिन सवाल का जवाब देने में राजद को शायद ही हिचक होगी, लेकिन वंचित तबकों के सपाट चेहरे मुख्य विपक्षी दल राजद के लिए एक बड़ा सवाल है, बड़ी चुनौती है.

लालू प्रसाद यादव को बड़े जनाधार वाला नेता बताया जाता रहा है. लेकिन राजद के संस्थापक लालू को उनके कारनामों ने जननेता ही बनाए रखा, जननायक नहीं बनने दिया. यह अंतर राजद नेताओं के पूरे अविश्वास के साथ वक्तव्यों से स्पष्ट होता है और अब तो चुनाव भी लालू की गैर मौजूदगी में ही लड़ना है.

2005 के विधानसभा चुनाव (फरवरी) में लोजपा ने 29 सीटें जीती थी. उस समय रामविलास पासवान एक मुसलमान को सीएम बनाना चाहते थे. लेकिन यदि स्वयं को उन्होंने सीएम पद का दावेदार बताया होता, तो संभवत आज बिहार की तस्वीर ही दूसरी होती. अब रामविलास पासवान हमारे बीच नहीं है, लेकिन ‘जन का मन’ काफी विह्वल है.

ऐसे में ‘लालू नाम केवलम’ को राजनीतिक चांदी समझने वालों को घोर निराशा हुई है. ना लालू के कारनामे उनका पीछा छोड़ रहे हैं और ना राजद विधानसभा चुनाव में अपने जनाधार को लेकर निश्चिंत हो पा रहा है.

सिर्फ महागठबंधन ही नहीं, एनडीए भी ऐसा कोई संकेत देता नजर नहीं आता जो ‘लकीर का फकीर’ वाली राजनीति से अलग किसी नए विचार से ओतप्रोत हो और समाज के हर तबके को सुंदर भविष्य की परिकल्पना से परिचित कराता हो.

निष्कर्ष यही है हर गठबंधन बिहार को विकास की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना चाहता है, लेकिन यह काम वह परंपरागत राजनीति के सहारे ही करेगा. परंपरागत राजनीति यानि जातिवाद, तुष्टिकरण, परिवारवाद, शराब और पैसा. इस परंपरागत राजनीति का परिणाम हमारे सामने है. नैतिक मूल्यों का ह्रास, अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई और आपराधिक कृत्यों में वृद्धि. इसे कौन रोकेगा? रुकेगा भी या कि नहीं? यदि हां, तो कौन रोकेगा? ज्यादा भरोसा तो नई पीढ़ी पर ही है.