लालू ने 2024 में भाजपा को उखाड़ फेंकने का किया ऐलान

पटना (TNB – अनुभव सिन्हा)। पिछले 9 अगस्त से अबतक बिहार का राजनीतिक माहौल (Bihar’s political climate) अपने रंग में पूरी तरह रंगता गया है. राजनीतिक प्रतिशोध की ऊर्जा बढ़ती जा रही है. यह वैसी टकराहट की वजह से है जो पहले दिन से शुरू हुई और आए दिन इसकी नुमाइश भी होती रहती है. जैसे, 4325 राजस्व कर्मियों की नियुक्ति महागठबंधन सरकार (grand coalition government) में पहली नौकरी का उदाहरण है लेकिन अब विपक्ष में बैठी भाजपा (BJP) ने इसका श्रेय लेने से सरकार को यह कहते हुए रोक दिया कि इन नियुक्तियों का फैसला तो एनडीए सरकार का था.

लेकिन जिस राज्य में लालू यादव (Lalu Yadav) और नीतीश कुमार (Nitish Kumar) जैसी शख्सियत के हाथों में सत्ता की बागडोर हो, वहां हितों का खेल बेहद शातिराना अंदाज में न खेला जाए, तब तो किसी बात का कोई मतलब ही नहीं रह जायेगा !

जैसे, राजद की राज्य परिषद की बुधवार को हुई बैठक में लालू यादव भी मौजूद थे. एक और पुराने समाजवादी शरद यादव (Sharad Yadav) भी पहुंचे हुए थे. पार्टी के अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी सहित अन्य लोग भी थे ही. इस मौके पर बड़बोले लालू यादव ने 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में भाजपा को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया.

ऐसा लगे कि …..

ये लालू यादव की तरफ से था. इसके पहले 10 अगस्त को ही नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) को तगड़ी चुनौती दे दी थी. चुनौती इतनी ऊर्जा से भरी हुई थी कि उससे बेजान से दिखने वाले देश भर के विपक्षी दलों को जैसे संजीवनी मिल गई हो! तब से बिहार की महागठबंधन सरकार ने ऐसा माहौल बनाना शुरू किया जिससे ऐसा लगे कि भाजपा का विजय रथ रोक दिया गया ही समझा जाए.

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लालू जैसे धुरंधर नेता पर जब कानून का हथौड़ा चला तब पूरी फिजा ही बदल गई. 1996 के 27 जनवरी को चारा घोटाले के उजागर होने के बाद लालू यादव को जितने पापड़ बेलने पड़े, उसकी झलक अब दिखाई देती है. चारा घोटाले में सजायाफ्ता होने, सांसदी गंवाने और मताधिकार से वंचित कर दिए जाने के बाद अब वह अपने बेटे तेजस्वी यादव को सीएम की कुर्सी पर जल्द से जल्द देखना चाहते हैं.

वैसे, लालू यादव ने बिहार में अपनी पकड़ कितनी मजबूत कर ली थी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2005 में दो बार चुनाव कराने पड़े, तब राजद को सत्ता से बेदखल किया जा सका था.

इसका असर पार्टी पर पड़ा लेकिन 2013 में राष्ट्रीय फलक पर नरेन्द्र मोदी के उदय ने थोड़े समय बाद लालू की पार्टी को जीवनदान दे दिया जब 2015 के विधान सभा चुनावों में नीतीश कुमार के साथ महागठबंधन हुआ और सरकार बनी.

महागठबंधन सरकार का नेक्स्ट वर्जन

मौजूदा महागठबंधन की सरकार पहले वाली सरकार का नेक्स्ट वर्जन है. बीच में 2017 के जुलाई में ब्रेक अप हो गया था, वह टाई अप हुआ बीते 9 अगस्त को. इस नेक्स्ट वर्जन वाली महागठबंधन सरकार में लालू यादव का हित तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाने से है और इसका रास्ता नीतीश कुमार को लोकसभा चुनावों में लगा देने से निकलता है.

वैसे, लालू यादव तेजी में भी हैं. बिहार के तीन विधान सभा सीटों पर उपचुनाव होना है. उसमें राजद दो सीटों पर चुनाव लड़ सकता है. एक सीट जदयू को मिलेगी. यदि राजद दोनों सीटें जीत लेता है तब मुमकिन है कि लालू यादव का नया रुप देखने को मिल जाए.

इन गहमागहमियों के बीच यह मानकर चला जा रहा है महागठबंधन के घटक के रुप में जदयू पूरी तरह से नीतीश कुमार के साथ खड़ा है. अब वह चर्चा शांत हो गई है कि जदयू का राजद में विलय हो जायेगा. पर, समाजवादियों की नब्ज पहचानने वाले राजनीतिक प्रेक्षकों का ख्याल जुदा है. उस ख्याल की खलबली जदयू में है लेकिन अभी शांत पड़ी-सी नजर आती है.

इसका ताल्लुक़ 9 अगस्त को भाजपा से संबंध तोड़ने के पहले जदयू की उस बैठक से है जिसके बारे में नीतीश कुमार ने बाद में मीडिया को बताया था. संबंध तोड़ने के फैसले में सबों की सहमति थी, ऐसा कहा था नीतीश कुमार ने. लेकिन अब बातें सामने आ रही हैं कि उस बैठक में नीतीश कुमार ने भाजपा के रवैये की शिकायत करते हुए संबंध तोड़ने का फैसला बताया था. प्रेक्षकों के अनुसार इस फैसले पर सहमति ली जाती, तब दूसरी स्थिति होती लेकिन वैसा नहीं हुआ इसलिए उसकी प्रतिक्रिया से इंकार नहीं किया जा सकता.