कहीं ये ‘लालू युग’ के खत्म होने का संकेत तो नहीं ?

पटना (TBN – The Bihar Now डेस्क) | बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल बजते ही सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपनी-अपनी कमर कस ली है. लगातार एक दूसरे के खिलाफ बयानबाज़ी और पोस्टरबाजी कर रही है. जेडीयू ने लालू परिवार पर तंज कसते हुए पोस्टर राजधानी के विभिन्न चौराहों पर लगाया है. जदयू के पोस्टर में कहीं कहीं पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम नीतीश कुमार को साथ में दिखाया गया है. दूसरी ओर आरजेडी दफ्तर के बाहर लगे पोस्टर में सिर्फ तेजस्वी यादव ही नजर आ रहे हैं.

आरजेडी ऑफिस के बाहर लगे इस पोस्टर में सिर्फ तेजस्वी यादव की तस्वीर है. इसमें न ही आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव की तस्वीर है और न ही तेजप्रताप यादव की. इस पोस्टर को लेकर लोगों के जेहन में कई तरह के सवाल उठने लगे हैं. लोगों ने यह सवाल पूछना शुरू कर दिया है कि जो तेजस्वी अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, उनके ही पोस्टर से पिता लालू यादव क्यों गायब हो गए? लोगों के जेहन में बहुत बड़ा सवाल यह उठने लगा है कि क्या तेजस्वी अपने पिता लालू की छवि से पीछा छुड़ाना चाहते हैं?

लालू प्रसाद यादव की अनुपस्थिति में 2019 का लोकसभा चुनाव सम्पन्न हुआ. इस चुनाव में तेजस्वी यादव ने आरजेडी की कमान संभाली थी. इस पर लोगों ने सोचा था कि तेजस्वी का नेतृत्व कुछ अलग होगा. लोगों ने सोचा कि तेजस्वी यादव अपनी नई सोच और नए तेवर के साथ बिहार की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाएंगे.

इधर तेजस्वी ने भी बिहार के लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए प्रयास भी खूब किया. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले तो तेजस्वी ने लोगों के सामने अपने आपको इस तरह से प्रोजेक्ट किया जिससे लगने लगा था कि वे बिहार के नेतृत्व के लिए तैयार हैं. तेजस्वी ने उस चुनाव में मुस्लिमों, पिछड़ा वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग और दलितों को उचित भागीदारी देने की बात कही. लेकिन उसी समय जिस तरह से उन्होंने सवर्ण आरक्षण का विरोध किया, लोगों ने समझा कि वह भी अपने पिता लालू की राह पर ही चल रहे हैं.

फिर जब 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजा सामने आया तो तेजस्वी को बड़ा झटका लगा. सवर्ण आरक्षण का विरोध तेजस्वी को महंगा पड़ गया था. इससे सबक सीख तेजस्वी ने जगदानंद सिंह को पार्टी का अध्यक्ष बनवा दिया. लेकिन तेजस्वी अपने पिता लालू यादव की यादव-मुस्लिम गठजोड़ को बचा नहीं पाए. यादव-मुस्लिम गठजोड़ में तब सेंध लग गया जब यह थोड़े थोड़े हिस्सों में ओवैसी, जदयू तथा अन्य छोटे राजनीतिक दलों में बंटने लगा. इससे तेजस्वी की कठिनाइयाँ बढ़ गई.

लेकिन दूसरी ओर राजनीतिक जानकार कह रहे हैं कि तेजस्वी की अपनी पार्टी आरजेडी पर पूरी पकड़ हो गई है. इस स्थिति में तेजस्वी अब अपने आप को ही बिहार का भविष्य बताएंगे. इस स्थिति में वे अपने पिता लालू यादव का चेहरा पीछे रखने की भी कोशिश करेंगे और इस प्रकार लालू का चेहरा पीछे छूट जाएगा.

आरजेडी ऑफिस के बाहर लगे उस पोस्टर में, जिसमें सिर्फ तेजस्वी ही दिख रहे हैं, के बारे में बीजेपी ने कहा है कि आरजेडी में कोई सिद्धांत नहीं है. उनकी कोई नीति भी नहीं है. ऐसे में तेजस्वी की निजी महत्वाकांक्षा के कारण ही पोस्टर में सिर्फ वही दिख रहे हैं.

दूसरी ओर आरजेडी के नेताओं ने कहा कि जिसको जो कहना है कहे, लेकिन उनकी पार्टी पूरी तरह से लालू प्रसाद यादव की विचारधारा पर चलती है. जहां तक तेजस्वी का सवाल है, तो वे पार्टी के सेनापति हैं. इसलिए पोस्टर में सिर्फ उनकी तस्वीर के गलत मायने नहीं निकालने चाहिए.

राजनीतिक जानकारों का यह भी कहना है कि राजनीति में पोस्टर और सीन से गायब होना कोई बड़ा मुद्दा नहीं होता है. ऐसा सभी पार्टियों में होता रहा है. उनका कहना है कि कभी नीतीश कुमार के पोस्टर से भी तो जॉर्ज फर्नांडीस गायब रहते थे, तो कहीं नरेंद्र मोदी के पोस्टर/तस्वीर में मुरली मनोहर जोशी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता गायब रहते थे.

लेकिन बिहार के संदर्भ में राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आरजेडी ऑफिस के पोस्टर में लालू प्रसाद यादव की तस्वीर का हटना और तेजस्वी का आगे आना ‘लालू युग’ के खत्म होने का संकेत भी है.

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