क्या लालू की विरासत संभाल पाना तेजस्वी के वश में नहीं!!

पटना (TBN – अनुभव सिन्हा)| बिहार में विधानसभा की दो सीटें पर हुए उपचुनावों के परिणाम आ गए हैं. दोनों सीटों पर फिर से जदयू (Janta Dal United) ने जीत दर्ज की और राजद (RJD) को मुंह की खानी पड़ी.

आमतौर पर उपचुनावों के परिणाम सत्ता पक्ष की झोली में जाते हैं. वैसे भी 2020 विधानसभा चुनावों में ये दोनों कुशेश्वर स्थान (Kushwshwar Sthan)और तारापुर (Tarapur) की सीटें जदयू ने ही जाती थी. लेकिन इस उपचुनाव में गजब का तड़का राजद ने लगाया था और उपचुनावों एक नई दिशा देने का जबरदस्त प्रोपेगैंडा चलाया जिसका मैसेज यह था कि न सिर्फ राजद दोनों सीटें जीतेगा बल्कि ऐसा होने पर सूबे में राजद की सरकार भी बनेगी.

इसलिए इस हार से न सिर्फ उसका सूपड़ा साफ हुआ बल्कि उसकी राजनीतिक संस्कृति भी पूरी तरह खारिज हुई. फरेब, प्रोपेगैंडा और झूठ के सहारे जिस तरह उसने मतदाताओं को भ्रमित करने की कोशिश की थी, वह उसके धोखेबाज और अविश्वसनीय चरित्र का ही प्रतिविम्ब था.

महत्वपूर्ण यह भी है कि इस चुनाव में लालू यादव (Laloo Prasad Yadav) भी कूदे थे और जिस तरह कांग्रेस पार्टी (INC) के प्रदेश प्रभारी भक्त चरण दास (Bhakt Charan Das) के लिए दिल्ली में अपशब्द का प्रयोग किया था, परिणाम बताता है कि किसी को साथ लेकर चलने की योग्यता और समाज को एकजुटता का संदेश देना राजद के डीएनए में है ही नहीं.

लालू यादव अपने पारिवारिक कलह को भी दूर नहीं कर पाए. दोनों भाइयों के बीच की तल्खी, राजनीतिक लाइन को लेकर थी जिसने तेजप्रताप (Tej Pratap Yadav) और कांग्रेस को न सिर्फ राजद से दूर किया बल्कि जीत को हार में बदल दिया.

परिणाम आने के बाद प्रतिपक्ष के नेता और राजद के स्टार कम्पेनर तेजस्वी यादव ने लड़ाई जारी रखने की बात कही है. लेकिन राजद की राजनीति की दशा-दिशा युवा नेतृत्व और ओल्ड गार्ड दोनों मिलकर भी निर्धारित कर पाने में सिर्फ इसलिए नाकामयाब रहे क्योंकि उनकी छवि दागदार है और उनका किरदार भरोसे पर खरा नहीं उतर पाई.

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बिहार के मतदाताओं की विडम्बना भी बड़ी दिलचस्प है. कभी मुख्यमंत्री को एक्सीडेंटल सीएम बताया जाता है तो कभी लालू यादव को अभीतक बिहार में गरीबों के सबसे बड़ा मसीहा होने के टैग को आगे बढ़ाया जाता है. ऐसी राजनीति का सही विश्लेषण मीडिया भी नहीं कर पाती क्योंकि मौजूदा ट्रेंड से चिपके रहने का उसके पास बहाना होता है. तथ्यों की गहराई समझने के बजाय मतदाता छिछले राजनीतिक संदेशों के आधार पर लालू यादव जैसे नेताओं की असलियत जबतक समझ पाती है, तबतक लोकतंत्र और विकास का पहिया गहरे गड्ढे में धंस चुका होता है.

मतदाताओं के समक्ष ऐसी दुविधा बनाए रखना ही राजद की राजनीति है. तेजप्रताप यादव ने व्यावहारिक राजनीति करनी चाही तो उनको किनारे कर दिया गया. दूसरी तरफ तेजस्वी यादव को भले ही लालू प्रसाद की राजनीतिक लाइन में ही अपना भविष्य नजर आता हो, लेकिन वह बिहार का भविष्य निर्धारित करने में सक्षम नहीं लगता.
(उपरोक्त लेखक के निजी विचार हैं)