जन सुराज की तरफ लोगों का बढ़ रहा रुझान

पटना (TBN – The Bihar Now डेस्क)| पिछले 32 वर्षों के लालू- नीतीश राज में सबसे ज्यादा राजनीतिक प्रयोग नीतीश कुमार ने किया. उनकी सफलता यह है कि 2005 से, बीच का थोड़ा सा समय छोड़ दें तब, वह मुख्यमंत्री बने हुए हैं. इसकी मंहगी कीमत बिहार को चुकानी पड़ रही है. ग्रामीण इलाकों की बदहाली वह कीमत है जिसके खिलाफ अब लोग जागरुक हो रहे हैं और परिवर्तन के लिए कमर कस रहे हैं. राजधानी में तो कुछ पता ही नहीं चलता !

हम बात कर रहे हैं उस जगह की, जो नेताओं के लिए राजनीतिक धर्म स्थली है. बात तब के चम्पारण की है जहां बापू आए थे और अंग्रेजों के खिलाफ सशक्त अभियान छेड़ा था. वह चम्पारण 1 दिसम्बर 1971 में पूर्वी और पश्चिमी चम्पारण में बांट दिया गया. बावजूद उसके पश्चिमी चम्पारण आज भी एक बड़ा जिला है और अधिसंख्य आबादी ग्रामीण है.

इस पश्चिमी चम्पारण के भितिहरवा से पिछले 2 अक्टूबर को एक प्रयोग शुरु हुआ जो लगातार विस्तार लेता जा रहा है. प्रशांत किशोर की जन सुराज पदयात्रा ही वह प्रयोग है जिसे लोग सही अर्थों में बापू के नाम से जुड़ा हुआ समझने लगे हैं. प्रशांत किशोर की जन सुराज पदयात्रा अभी जिले के मैनाटांड़ प्रखण्ड में है.

इस प्रखण्ड में 16 पंचायतें हैं और कुल 97 गांव हैं. प्रखण्ड की कुल आबादी 1,90,744 है जिसमें 99,593 पुरुष और 91,151 महिला हैं. यह संख्या 2011 की जनगणना पर आधारित है. यह तो एक प्रखण्ड के आंकड़े हैं जबकि जिले में कुल 18 प्रखण्ड हैं.

इस प्रखण्ड की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जाना चाहिए कि पश्चिमी चम्पारण जिले की कुल आबादी 2011 की जनगणना के आधार पर 39,35,042 थी. इसमें शहरी आबादी 3,93,165 और बाकी 35,41,877 आबादी ग्रामीण है. इस ग्रामीण आबादी का 1,55,114 हिस्सा खेती करता है जिसमें 1,33,362 पुरुष और 21,752 महिलाएं शामिल हैं. खेतिहर मजदूरों की कुल संख्या 4,64,772 है जिनमें 3,47,032 पुरुष और 1,17,740 महिलाएं हैं. यह आंकड़े जिले भर के जिनमें प्रखण्ड भी शामिल हैं. ये जो आंकड़ा है 4,64,772 का, यह बेहद वल्नेरेबल है.

यह रोज की ज़िन्दगी जीता है और फ्लोटिंग फोर्स के रुप में इसका अनुपात ज्यादा रहता है. संख्या कम होने के बावजूद महिलाएं भी इसमें शामिल हैं. और यह तभी मुमकिन हो पाता है जब इन्हें व्यवस्था से किसी भी तरह की मदद नहीं मिलती. इसलिए जिला मुख्यालय का स्वरुप जहां शहरी होता गया है वहीं ग्रामीण इलाकों की सुधि लेने वाला कोई नहीं है.

सच यही है कि ग्रामीण इलाकों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है जो विकास से कोसों दूर है और पारम्परिक जीवन शैली में अर्थोपार्जन के लिए मुख्य स्रोत के रुप कृषि पर ही निर्भर है. खासकर कृषि मजदूरों के पलायन पर प्रशांत किशोर ने शुरु से ही संवेदना दिखाई है क्योंकि पूरे राज्य भर की स्थिति ऐसी ही है. इनके लिए उनके पास ठोस योजना है.

अपनी आर्थिक विषमताओं से अलग यह ग्रामीण आबादी राजनीतिक रुप से जागरुक है और लम्बे समय से छले जाने के कारण इनका मनोभाव किसी भी नई स्थिति के लिए तत्पर रहता है. ऐसे में जब प्रशांत किशोर की पदयात्रा में शामिल परिचित ग्रामीण इन्हें दिखाई देते हैं, तब इनकी भी उत्कंठा जागृत होती है और किशोर को सुनने के लिए देखते ही देखते पूरा गांव उमड़ पड़ता है. इलाके की प्रचलित भाषा भोजपुरी है और किशोर भी भोजपुरी भाषी हैं, इससे भावनाओं के आदान-प्रदान में सहुलियत होती है और निकटता बढ़ती है.

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यही वजह है कि मंगलवार 11 अक्टूबर को प्रखण्ड के 16 पंचायतों के सरपंचों ने प्रशांत किशोर से मुलाकात की और जन सुराज के उद्देश्यों पर उनसे चर्चा की.

ग्रामीण इलाकों का दुर्भाग्य बहुकोणीय है. बावजूद उसके अपनी ग्रामीण अस्मिता को बचाए रखना भी चाहते हैं. इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों की अवहेलना की कसक और उसे दूर करने का जज्बा कम नहीं होता, जिसकी झलक जन सुराज पदयात्रा में उनकी सहभागिता के रुप में दिखाई पड़ती है. मंगलवार को जय प्रकाश नारायण की 120वीं जयंती के अवसर पर प्रशांत किशोर ने उन्हें श्रद्धासुमन किया. मौके पर उपस्थित ग्रामीणों ने भी इस कार्यक्रम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया.