कंगना के बयान की गहराई से कांप रहे नकलची

पटना (TBN – The Bihar Now – अनुभव सिन्हा की रिपोर्ट)| आजादी 1947 में या 2014 में ? जानीमानी फिल्म अदाकारा कंगना रनौत (Kangana Ranaut Actress) के आजादी मिलने से जुड़े एक बयान को विवादित (Controversial Statement over Independence of India) बताया जा रहा है. इसलिए अदाकारा के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की जा रही है. ऐसी मांग करने वालों में तिलमिलाई कांग्रेस (Congress) अकेली नही है, कथित समाजवादी भी इसमें शामिल हैं.

कंगना ने अपने बयान में कहा था कि 1947 में जो आजादी मिली, वह भीख थी. असल आजादी 2014 में मिली. कंगना का यह बयान कांग्रेस को नंगा करने के लिए नहीं था, बल्कि उसके नंगेपन की वजह से देश की “चेतना” में जो नंगापन आया, उसके लिए है. 2014 का दूसरा मतलब हैं नरेन्द्र मोदी जिन्होंने उस वर्ष केन्द्र की सत्ता संभाली. इन वजहों से कांग्रेस तिलमिलाई हुई है और अन्य अपनी रोटी सेंकने में लगे हैं.

लेकिन कंगना के बयान सही मायने में इशारा क्या करते हैं ? क्या वाकई अंग्रेजों को मुंहतोड़ जवाब देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों की अवहेलना करता है कंगना का बयान ? बयान से यह स्पष्ट नहीं होता और इसी का फायदा उठाने की कोशिश की जा रही है.

बयान की चोट इन पर है

सच क्या है ? अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों की बात छोड़ दें तब बीसवीं शताब्दी के मुखर सेनानियों की भी परवाह कांग्रेस ने नहीं की थी. क्योंकि उसे सिर्फ नेहरु से मतलब था और है. कंगना के बयान में चोट इसी सच्चाई पर है. महात्मा गांधी ने चहेते नेहरु के लिए जो मानदण्ड अपनाया, बयान की चोट उसपर है. पीएम बनने के बाद देश के विकास के नाम पर नेहरु ने जो कुछ भी किया, सार्वजनिक उपक्रमों को जिस तरह से भ्रष्टाचारियों के हवाले कर दिया, बयान की चोट उसपर है. आज पूरा देश भ्रष्टाचार की चपेट में है, बयान की चोट उसपर है. नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर नकेल कस दी है, 2014 में मिली आजादी का मतलब इस बात से है.

यह पाखण्ड है कांग्रेस का

कंगना का बयान 1947 के पहले की घटनाओं से ताल्लुक़ रखता ही नहीं है. यह कंगना के बयान की वह गहराई है जिसने कांग्रेस को अंदर तक हिला दिया है. नेहरु के कारनामें वास्तव में अच्छे थे तो मुस्लिम तुष्टिकरण की आग में चौबीस घंटे झुलसने वाली कांग्रेस को जवाब देते क्यों नहीं बन रहा ? क्यों उसकी दूसरी-तीसरी पंक्ति के नेता ही एफ आई आर करवा रहे हैं ? यह नेतृत्व का इशारा हो सकता है लेकिन बात जब उसके नंगापन की हो, तब नेतृत्व खुद क्यों नही मोर्चा संभालता ? यह पाखण्ड है कांग्रेस का.

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कंगना रनौत का बयान सियासी है लेकिन इससे जूझने में कांग्रेस को वामपंथियों का साथ नही मिल रहा है. इसकी वजह अलग है और वामपंथियों की सियासत भी अलग ही है, इसलिए वह खामोश हैं.

सोशल मीडिया खासकर ट्वीटर पर रनौत की आलोचना और प्रशंसा दोनों देखने को मिल रही है. लेकिन गम्भीर वालों के जवाब चूंकि हल्के ढंग से नहीं दिए जा सकते, सोशल मीडिया पर आ रही प्रतिक्रियायें रनौत की आलोचना तो करती हैं लेकिन एक परसेप्शन बना पाने में समर्थ नहीं हैं.

फिर भी इतना जरूर कहा जा सकता है कि कंगना के बयान पर एक सकारात्मक बहस हो सकती थी जिसे आजादी के पहले की घटनाओं से जोड़कर कांग्रेस ने बहस की दिशा को बदल कर विवादित बना दिया और देश का मूड भांप रही है.
(उपरोक्त लेखक के अपने विचार हैं)