क्या राहुल और तेजस्वी का राजनीतिक भविष्य है एक जैसा?

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी INC) का नेतृत्व करने वाली सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) की एकमात्र ख्वाहिश राहुल गांधी (Rahul Gandhi) को देश का पीएम बने देखने की है. इस बिन्दु पर सोनिया गांधी ने अभीतक कोई कम्प्रोमाइज नही किया है. ठीक वैसा ही सपना लालू यादव (Laloo Prasad Yadav RJD Supremo) का भी है. वह भी तेजस्वी यादव (Tejaswi Yadav) को बिहार का सीएम बना देखना चाहते हैं बिना किसी कम्प्रोमाइज के.

यही वजह है कि राजनीतिक रणनीतिकार के रुप में अपनी पहचान बना चुके प्रशांत किशोर (Prashant Kishore) की कांग्रेस के जरिए बिहार में इंट्री नही है. लालू यादव को इसकी वजह बताया जा रहा है. लालू नही चाहते कि बिहार में तेजस्वी यादव के नेतृत्व को कोई चुनौती मिले. बताया जाता है कि किशोर बिहार में फ्री हैण्ड चाहते हैं जो लालू को मंजूर नही है और कांग्रेस लालू यादव को नाराज करने से हिचकती है.

यह तब है जब हाल ही में उपचुनाव (Bihar Assembly By-Election  2021) के दौरान बिहार में कांग्रेस और राजद का गठबंधन टूट गया. कांग्रेस के प्रति कड़े शब्दों का इस्तेमाल करने वाले लालू यादव ने बाद में कुशेश्वर स्थान (Kusheshwar Sthan) की एक चुनावी सभा में सोनिया गांधी से बातचीत होने की बात कहकर कांग्रेस को देश की जरुरत बताया था. कांग्रेस की प्रदेश इकाई ने लालू के बयान को झूठा बताते हुए खण्डन भी किया था. फिर भी प्रदेश इकाई इस बात से आश्वस्त नही है कि आलाकमान राजद से अलग होने के फैसले को मंजूरी दे ही देगा.

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दूसरी तरफ एक मौका आया और राजद ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी, पर उपचुनाव में कुशेश्वर स्थान और तारापुर (Tarapur) विधानसभा की दोनों सीटों पर मिली करारी हार के बाद उसकी राजनीतिक गतिविधियों को नए तरीके से धार देने का मंथन होने की खबर है.

राजद की सारी कवायद के केन्द्र में तेजस्वी यादव हैं. लेकिन राजद का नेतृत्व करने वाले तेजस्वी यादव का “इमेज” पिता लालू यादव की “जिताऊ वाली छवि” जैसी नही है. इसलिए लोग तेजस्वी यादव की तुलना राहुल गांधी से करने लगे हैं. गौरतलब है कि तेजस्वी और राहुल की सभाओं में भीड़ तो उमड़ती है, पर दोनों पार्टी के लिए “जिताऊ” साबित नही हुए हैं.

गौरतलब है लालू यादव, तेजस्वी यादव को सीएम बनाने का सपना पाले हुए हैं और इस बिन्दु पर वह कोई कमप्रोमाईज नही करेंगे. हालांकि उपचुनावों में लालू का करिश्मा चारों  खाने चित्त हो गया और सत्ता पक्ष ने उनके जातीय समीकरण के ध्वस्त होने का दावा भी किया लेकिन अब चूंकि 2024 के पहले बिहार में कोई चुनाव नही है, राजद के सामने अब लम्बा इंतजार है.

(वरिष्ठ पत्रकार अनुभव सिन्हा का आलेख)