आपराधिक चरित्र के माननीयों पर चला कोर्ट का चाबुक, किया सख्ती बरतने का फैसला

पटना (TBN – वरिष्ठ पत्रकार अनुभव सिन्हा की खास रिपोर्ट)| यदि इस सवाल पर गौर किया जाए कि सुप्रीम कोर्ट का 16 सितम्बर 2020 को आया एक आदेश किन परिस्थितियों की वजह से था, तब यह स्पष्ट हो पायेगा कि तीन संवैधानिक अंगों कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका अपने दायित्वों का निर्वहन कैसे करती हैं.

देश में कानून का राज है और सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) इसे सुनिश्चित करता है. मगर विधायिका की प्रकृति में आए बदलाव ने कार्यपालिका के साथ उसके अन्तर्संबंधों (interrelationship between legislature and executive) का स्वरूप ही बदल दिया है. कानून बनाने वाली विधायिका में माननीयों की आपराधिक पृष्ठभूमि (Honorable Political Leaders with tainted back-ground) ने कानून के साथ जिस तरह से छेड़छाड़ को पुख्ता किया उससे कई सवाल पैदा होते गए और अन्ततः एक याचिका का निष्पादन करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माननीयों के आपराधिक मामलों की ढिलाई पर सख्ती बरतने का फैसला किया.

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती का आयाम देश व्यापी है. देश के सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को इस बाबत सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि माननीयों के लंबित और दर्ज मामलों के निष्पादन में विलम्ब के कारणों को चिन्हित कर उन्हें प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जाए.

सुप्रीम कोर्ट के इसी निर्देश के आलोक में पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) के मुख्य न्यायाधीश संजय करोल (Chief Justice Sanjay Karol) और न्यायमूर्ति एस कुमार (Justice S Kumar) की खण्डपीठ बिहार सरकार से इसी महीने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले माननीयों (एमपी, एमएलए और एमएलसी) की पूरी सूची तलब की है. खण्डपीठ द्वारा बिहार के गृह विभाग को भेजे गए इस निर्देश का दायरा काफी बड़ा है जिसमें “बेचारी पुलिस” की भूमिका भी है. अब अगली सुनवाई में यह देखना दिलचस्प होगा कि गृह विभाग अपने जवाब से खण्डपीठ को संतुष्ट कर पाता है नहीं.

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जानकारी के लिए बताते चलें कि पटना उच्च न्यायालय ने बिहार में राजद के शासन काल को “जंगल राज” ऐसे ही नहीं बताया था. राजद के हाथों से एक बार सत्ता जो फिसली, दुबारा हासिल करने के लिए उसे नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं, लेकिन उसके मिजाज में, फितरत में कोई बदलाव नहीं आया है. इसे 2020 के विधानसभा चुनाव परिणामों से समझा जा सकता है.

पिछले विधानसभा चुनाव में 243 सीटें पर हुए चुनावों में राजद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरा था. उसने 75 सीटें जीती थी. लेकिन उनके 75 में से 54 माननीय आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं जिनके खिलाफ मामले हैं. संख्या गौर करने लायक है. 75 में से उसके 54 विधायक अपराध कार्य में लिप्त पाए गए हैं.

इसी तरह भाजपा (47), जदयू (20), कांग्रेस (16), भाकपा-माले (2) पार्टियों के माननीय भी हैं जिन्हें “विनेबिलिटी” के आधार पर टिकट मिला और उन्होंने चुनाव भी जीता. राजनीतिक दलों की इस प्रवृति का इलाज जनता के हाथ में हो सकता है यदि “राइट टू रिकाल” का अधिकार मिल जाए. लेकिन यह तो सरकार, राजनीतिक चेतना और समाज के विकसित होने का चरम है…!!! ऐसे में अदालतें ही भारतीय लोकतंत्र की रक्षक हैं.

पटना हाईकोर्ट ने गृह विभाग से जो जानकारियां देने का निर्देश दिया है, उसके मूल में “विलम्ब क्यों” जैसी महत्वपूर्ण जानकारी देना भी शामिल है. कोर्ट का यह स्पष्ट निर्देश है कि एमपी / एमएलए /एमएलसी जैसे माननीयों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी और जांच की प्रगति रिपोर्ट पेश की जाए. दूसरे, इस बात की भी विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया गया है कि आरोपी माननीयों के खिलाफ लंबित मुकदमें किस स्टेज में हैं और उनके पक्ष में कितने मामलों पर स्टे लगाए गए हैं.

बताते चलें कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देश में सभी मुख्य न्यायाधीशों से यह भी कहा था कि जिन आपराधिक मामलों में स्टे दिया गया है उन्हें प्राथमिकता के आधार पर देखा जाए और प्रतिदिन के आधार पर उनकी सुनवाई की जाए. पटना उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह गुरुवार को अपने आदेश में माननीयों के खिलाफ विभिन्न पुलिस मामलों में की जा रही सभी लंबित जांचों के बारे में विवरण मांगा है. इन जांचों को समय सीमा के भीतर पूरा करने और उसकी पूरी जानकारी मांगी है.