Big NewsPatnaPoliticsफीचरसंपादकीय

देश के साथ-साथ विदेश से भी कांग्रेसी टूल किट को मिलने लगा जवाब

पटना (TBN – वरिष्ठ पत्रकार अनुभव सिन्हा की रिपोर्ट)| शायद ही किसी ने सोचा हो कि ऐसा भी हो सकता है ! लेकिन ऐसा हुआ और इसकी अनुभूति उतनी ही व्यापक है जितनी उसे होनी चाहिए. समाज की दशा-दिशा को निर्धारित करने वाली लोकतांत्रिक संस्थाओं में मौजूद अवांछनीय और मनोरोगी कोटि के जनप्रतिनिधियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके मानवाधिकार का पक्ष कितना ओछा हो सकता है, इसका जवाब सामने आया है. दरअसल, यह विश्व स्तर पर कुख्यात हो चुके भारत के कांग्रेस टूल किट का ही जवाब है.

यह जवाब दिया है अफ्रीकी-अमेरिकी अभिनेत्री एवं गायिका मैरी मिलबेन ने. मिलबेन एक कलाकार हैं. कलाकार होने के नाते उनकी संवेदनशीलता, उनकी भावना, उनकी जागरुकता कितनी व्यापक है यह उनके दृष्टिकोण से स्पष्ट होता है. इस रूप में उनके दृष्टिकोण की तुलना यदि कांग्रेस टूल किट से की जाय, तो दोनो के बीच अन्तर भी उतना ही व्यापक है. विदेशों में सक्रिय कांग्रेसी टूल के नुमाईंदों की फण्डिंग कांग्रेस नहीं करती बल्कि धनराशि उपलब्ध कराने वाले भी विदेशी हैं जिनके पैसों से भारत में उसका टूल किट अपनी सक्रियता बनाए रखता है. विदेश समर्थित इस टूल किट का उद्देश्य भारत को कमजोर बनाए रखना, विश्व का बाजार बने रहने की पुरानी स्थिति बहाल करना, कांग्रेस की मिट्टी पलीद करने वाली मजबूत सरकार को अस्थिर कर सत्ता से बाहर कर देने पर केन्द्रित है.

इसके विपरीत मिलबेन ने भारत के बिहार में घटी एक घटना पर जो प्रतिक्रिया दी वह सिर्फ एक हल्की सी आंच है जिसका उद्गम सांस्कृतिक ऊर्जा है. इस सांस्कृतिक ऊर्जा की आंच को, उसकी तपिश को झेल पाना जार्ज सोरोस जैसे फाइनांसर, उसकी महिला सहयोगी विश्वनाथन, कांग्रेसी टूल किट का विदेशों मे प्रबंधन करने वाले सैम पित्रोदा, विभिन्न देशों में तख्ता पलट में महारत रखने वाली सामंथा पावर जैसे लोगों के न तो वश में है और न दोनो की तुलना ही हो सकती है. टूल किट की गतिविधियां पूरी तरह से नाकारात्मक हैं जबकि मिलबेन की प्रतिक्रिया पूरी तरह से सकारात्मक हैं.

दरअसल, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जनसंख्या नियंत्रण को लेकर एक स्तरहीन विवादित बयान दिया था जो महिलाओं की गरिमा पर आघात था. उस बयान के फैलने में देर नहीं लगी और एक कलाकार की संवेदनशीलता सामने आ गई. मिलबेन की यह संवेदनशीलता ही है जो बताती है कि कैसे प्रकृति की निरंतरता के लिए प्रजनन आवश्यक है और कैसे सृष्टि के सौंदर्य को सांस्कृतिक उष्मा निखारती है. यह दायित्व महिलाएं ही निभाती हैं. महिला तो स्वंय में प्रकृति है, संस्कृति है और उर्जा का अक्षय स्रोत है. उनके योगदान को विकृत और वीभत्स तरीके से चित्रित करने की चेष्टा स्वंय को आग के हवाले करने जैसा है. मिलबेन ने यह भी कहा कि यदि वह भारत की नागरिक होतीं तो बिहार जातीं और चुनाव लड़तीं. उनके अनुसार बिहार में सीएम की कुर्सी पर महिला को बैठना चाहिए.

मिलबेन अफ्रीकी मूल की अमेरिकी नागरिक और एक सेलीब्रिटी हैं. सौहार्द्र के बीच अफ्रीका की गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा जैसे मार्मिक पक्ष से वह अवगत हैं. उन्हें इस बात का इल्म है कि समाज की नियामक बनी राजनीति यदि सशक्त है तो विरोधी शक्तियां अड़चन पैदा करेंगीं. पर यह उनके लिए हैरत की बात हो सकती है कि बिहार की राजनीति जिनके हाथों में केन्द्रित है वह कितने अवांछनीय और कुपात्र हैं. एक मुख्यमंत्री के बयान से आहत मिलबेन की संवेदना राजनीति से प्रेरित नहीं है. एक महिला और कलाकार होने के नाते यह उनका सांस्कृतिक पक्ष ही है जो भौगोलिक सीमाओं से न सिर्फ परे है, बल्कि जो महिला को उसकी पूरी गरिमा में देखता है. अन्यथा इसे मिलबेन के भारतीय लगाव के रूप में देखा जाय तो यह शायद उनकी पहली प्रतिक्रिया है.

इसलिए इसे कांग्रेसी टूल किट के जवाब के रूप में देखा जाना चाहिए. सांस्कृतिक बंधन किसी भी तरह की विभाजनकारी शक्ति को नष्ट कर सकता है.