बिहार की राजनीति में पुष्पम प्रिया का प्रवेश

 

पटना| दुनिया को सबसे पहले लोकतंत्र की व्यवस्था देने वाला बिहार आज जितना अतीत देखता है, उसी अनुपात में वह आगे की ओर छलांग नही लगा पाता. महात्मा बुद्ध की बात उसे अक्सर याद आती है. आग, पानी और कलह को भगवान बुद्ध ने बिहार के लिए अभिशाप बताया था. दुर्भाग्य से बिहार आज भी उन अभिशापों से ग्रस्त ही है. आग और पानी जहां कुदरती आफत हैं वहीं कलह मानव निर्मित है और इसका स्वरूप राजनीतिक है.
इस राजनीतिक कलह की विशेषता बड़ी ठोस है जिसमे जातिवाद और साम्प्रदायिक तुष्टिकरण की भूमिका प्रमुख है. यहां तक कि कुछ राजनीतिक दलों के लिए यह संजीवनी का काम करता है.
इस साल बिहार में चुनाव होने है और मुख्यमंत्री पद के लिए दो नाम यहां के मतदाताओं के सामने है. एनडीए से नीतीश कुमार और राजद से तेजस्वी यादव.
इसी बीच बीते रविवार को मुख्यमंत्री पद के लिए तीसरे नाम का प्रभावशाली तरीके से अचानक प्रकटीकरण हुआ. यह नाम है पुष्पम प्रिया चौधरी.
पुष्पम युवा हैं. सोशल मीडिया पर सक्रिय रहती आयी हैं। उच्च शिक्षा विदेश में ली है. बिहार के दरभंगा की रहने वाली पुष्पम के पिता और दादा दोनों नीतीश कुमार के करीबी रहे हैं. राजनीतिक पृष्ठभूमि रही है, इसलिए बिहार की राजनीति में इन्होंने प्रवेश किया है.
लेकिन इनका प्रवेश धमाकेदार हुआ है. युवा और ऊर्जा से लबरेज पुष्पम की एंट्री ने अचानक ही फ़िनलैंड की 34 वर्षीया युवा प्रधानमंत्री सना मरीन का अक्स सामने ला दिया है. सना मरीन न सिर्फ सबसे कम उम्र की पहली प्रधानमंत्री हैं बल्कि कई अन्य उन अनगिनत कारणों से चर्चा में हैं जिन्हें राजनीतिक रूप से अपरम्परागत माना जाता है.
पुष्पम राजनीतिक रूप से सना मरीन से समानता रखती हैं और यह बिहार के लिए न सिर्फ नया है बल्कि रोमांचक भी है.
इनकी एंट्री को बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में देखना सिर्फ इसलिए सामान्य नही है कि चुनाव कोई भी लड़ सकता है. राजनीतिक परिदृश्य को अभी तक विस्तार नही दिया गया तो उसके पीछे लकीर का फकीर की राजनीतिक संस्कृति है. यह संस्कृति इस साल के अंत मे होने वाले विधान सभा चुनावों में 15 साल बनाम 15 साल के रूप में लाये जाने की तैयारी अभी से चल रही है.
बिहार में गरीबी, बेरोजगारी और “अभाव की राजनीति” तो है ही, शिक्षित युवाओं की कल्पनाओं को पंख देने वाली सियासत नही है. उच्च शिक्षा प्राप्त पुष्पम की ओर शिक्षित युवाओं का रुझान बढ़ सकता है. बिहार की राजनीति ने जितना गरीबी पर जोर दिया उतना शिक्षा और शिक्षितों पर नही दिया. पुष्पम इस बिंदु पर एक नज़ीर बन सकती हैं.
पिछले कुछ समय से हो रहे लोक सभा और विधान सभा चुनावों में ग्रामीण क्षेत्रों की महिला मतदाताओं बढ़ी भागीदारी ने विरोधी दलों के मंसूबों को ध्वस्त किया है. उसके पीछे का कारण बड़ा दिलचस्प है. माँ होने के कारण ग्रामीण महिला मतदाताओं को उनकी बेटियों के विमर्श ने निर्णय लेने में उन्हें सबल बनाया है. ग्रामीण इलाकों में सरकारी योजनाओं का लाभ एक कारण तो है लेकिन बेटियों के शिक्षित होते जाने के कारण माताएं उनके उज्ज्वल भविष्य को लेकर लकीर का फकीर बनी रहना नही चाहतीं. लेकिन फिलहाल यही स्थिति है और पुष्पम के लिए इस स्थिति को अपने अनुकूल बनाने के अवसर हैं.
बिहार विधान सभा चुनाव के मद्देनजर पुष्पम प्रिया चौधरी के अलावा एक युवा नाम और भी है. यह नाम है प्रशांत किशोर, जो चुनिंदा कारणों से विवाद में हैं लेकिन उनकी राजनीतिक रणनीति का लोहा सब मानते हैं.
बिहार में जातिवाद और मुस्लिम तुष्टिकरण एक बड़ी समस्या है तो पिछड़ापन, गरीबी, पलायन और बेरोजगारी समस्याएं अपनी जगह पर यथावत बनी हुई हैं. लेकिन चुनाव के समय प्रभावित मतदाता अपना फैसला जातिवाद और साम्प्रदायिक आधार पर करते हैं, यह चुनौती जितनी अब प्रशांत किशोर के सामने है उतनी ही पुष्पम प्रिया चौधरी के लिए भी है.
शिक्षित युवाओं के लिए पुष्पम आशा की एक नई किरण हो सकती हैं तो अर्धशिक्षित युवाओं की प्राथमिकता भी उनके लिए एक चुनौती ही है जिनकी संख्या शिक्षितों की तुलना में ज्यादा है. लेकिन सच तो यह भी है कि युवा वर्ग ही परिवर्तनकारी भी होता है.
लब्बोलुआब यह कि पुष्पम की एंट्री से लकीर का फकीर वाली बिहार की सियासत क्या करवट बदल पाएगी , यह स्थिति न सिर्फ देखने लायक है बल्कि यह सामने भी आने वाला है. एक मंजे हुए राजनीतिक खिलाड़ी की तरह ही पुष्पम अपने पत्ते खोलेंगी. उनकी तैयारी का आलम कुछ ऐसा ही है.

(वरिष्ठ पत्रकार अनुभव सिन्हा की कलम से)