मौका मिलते ही लूट ली DMCH की दान में मिली जमीन

फाइल फ़ोटो

दरभंगा (TBN – वरिष्ठ पत्रकार अनुभव सिन्हा की खास रिपोर्ट)| इतिहास और वर्तमान का फर्क देखना हो तो दरभंगा जिला प्रशासन की काहिली और अफसरानो की काबिलियत पर नजर डालिए. दरभंगा राज (Darbhanga Raj) ने डीएमसीएच (Darbhanga Medical College Hospital) की स्थापना के लिए 300 एकड़ जमीन दी थी. लेकिन 227 एकड़ जमीन के ही प्रमाण मौजूद हैं. बाकी 73 एकड़ जमीन का क्या हुआ, इस मसले पर डीएमसीएच और जिला प्रशासन आमने-सामने है. अगर इस मामले की निष्पक्ष जांच हो तो जिन महानुभावों ने 73 एकड़ जमीन में अपने घोंसले बनाए, वह किसी-न-किसी राजनीतिक बगिया का ही मिलेगा. यह वर्तमान है. अब नीचे दरभंगा राज का इतिहास देखिए.

दरभंगा राज का संक्षिप्त इतिहास

बात 1888 की है. तत्कालीन एलाहाबाद और अब प्रयागराज में कांग्रेस का सम्मेलन होने वाला था. इस सम्मेलन के महत्व को देखते हुए ब्रितानी हुकूमत ने इस पर रोक लगा दी. उस समय गांधी-नेहरू कहीं भी पर्दे पर नहीं थे. कांग्रेस के कर्ताओं में घोर निराशा छाई हुई थी. सम्मेलन में देश भर से कार्यकर्ता आने वाले थे और किसी भी सार्वजनिक स्थान के अभाव में सम्मेलन नहीं हो सकता था, पर किसी को कुछ सूझ भी नहीं रहा था कि इस समस्या का समाधान कैसे निकाला जाए.

कांग्रेस को दान में दिया महल

कांग्रेस के संस्थापक सदस्य और दरभंगा के महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह (Maharaj Laxmeshwar Singh of Darbhanga) आगे आए और उन्होने रातोंरात इलाहाबाद का सबसे बड़ा महल खरीद लिया. उस महल के परिसर में अगले दिन कांग्रेस का भव्य कार्यक्रम सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ. कार्यक्रम के बाद महाराज ने वह महल कांग्रेस पार्टी को दान कर दिया. पर, उनके जन्मदिन (23 जनवरी) पर कांग्रेस पार्टी ने ट्वीटर करके भी उन्हें श्रद्धांजलि नहीं दी.

यह भी पढ़ें| खान सर बिहार से बाहर नहीं जा सकेंगे, पुलिस ने दी हिदायत

विश्व विख्यात बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी की कहानी भी ऐसी ही है. महामना मदन मोहन मालवीय (Mahamana Madan Mohan Malviya) तो सबकी जिह्वा पर हैं पर महाराज को लोग भूल बैठे हैं. बीएचयू की स्थापना के लिए जो हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसाइटी (Hindu University Society) बनी थी, उसके अध्यक्ष महाराज रामेंश्वर सिंह (Maharaj Rameshwar Singh) थे. उनकी पहल से ही देश भर के महाराजाओं ने विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए दान दिया. स्थापना के लिए उस समय एक करोड़ रूपया जुटाने का लक्ष्य था. पहला डोनर बनकर महाराज ने अकेले एकमुश्त 50 लाख रूपया दिया था. सबसे बड़े आर्थिक सहयोगी थे महाराज, लेकिन बीएचयू भी उनको श्रद्धांजलि नहीं देता.

शायद ही कभी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (Aligarh Muslim University) अपने स्थापना के सबसे बड़े गैर मुस्लिम डोनर दरभंगा महाराज को याद करता है. न बिहार सरकार कभी याद करती है बिहार राज्य गठन आंदोलन के सबसे बड़े सहयोगी दरभंगा महाराज को. PMCH को आज सबसे बड़ा अस्पताल बनाने में लगी है सरकार, किंतु शायद ही किसी को पता हो कि उसकी स्थापना में महाराज का क्या योगदान था.

DMCH में एम्स बन रहा है, सोचिए कि वो कैसा महाराजा रहा होगा जिसने 70 साल पहले अपने राजधानी के बीचों बीच 300 एकड़ परिसर में अस्पताल बनवाया था. वो कैसा महाराजा रहा होगा जिसके बनाए एयरपोर्ट्स दरभंगा और पूर्णिया में उस वक्त हवाई सेवा बहाल थी, वो कैसा महाराजा रहा होगा जिसके काल में रेलवे, बिजली जैसी चीजें दिल्ली के समकाल में दरभंगा आ गई थी. वो महाराजा जो हिंदी में आर्यावर्त Aryavart) , इंग्लिश में इंडियन नेशन (Indian Nation) और मैथिली में मिथिला मिहिर (Mithila Mihir) नाम से अखबार चलाता था. वो महाराजा जिनके बनाए चीनी मिल, जुट मिल, सूत मिल, पेपर मिल आदि के बंद पड़े कारखानों से स्क्रैप बेचकर लोग करोड़पति हो गए. पर सबसे ज्यादा लज्जित करने वाली बात यह है कि खुद मैथिलवासी दरभंगा राज की प्रशासनिक दक्षता और दानशीलता को भूल चुके हों तब कांग्रेस, BHU, AMU आदि के बारे में जितना कम कहा जाए, उतना ही बेहतर होगा.

इसकी जानकारी तब हुई जब डीएमसीएच परिसर में ही 200 एकड़ जमीन पर एम्स की स्थापना पर कार्य शुरू होने की सुगबुगाहट हुई. इरादा यही था कि 200 एकड़ में एम्स की स्थापना होगी और शेष बची 100 एकड़ जमीन पर डीएमसीएच को अपग्रेड किया जायेगा. लेकिन तस्वीर सामने है.

73 एकड़ जमीन का कोई प्रमाण नहीं मिल रहा है, यह खबर सिर्फ एक दिन की सुर्खियां बनकर रह गया. अब डीएमसीएच और जिला प्रशासन इस मसले का हल ढूंढना में लगे हैं. शायद यही इतिहास और वर्तमान का वह अंतर है जिसमें संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता की कमी है. शायद यह भी राजतंत्र और लोकतंत्र (भीड़तंत्र) का अंतर है.

(उपरोक्त लेखक के निजी विचार हैं)