पद की नहीं लालसा नहीं करते थे किंग महेंद्र, फिर भी बने महेंद्र प्रसाद से किंग महेंद्र

पटना (TBN – The Bihar Now डेस्क)| जनता दल यूनाइटेड (JDU) के राज्यसभा सांसद व देश के एक बड़े दवा बिजनेसमैन, महेंद्र प्रसाद का लंबी बीमारी के बाद दिल्ली में निधन हो गया. रविवार आधी रात उन्होंने आखिरी सांसें ली. वे 81 वर्ष के थे. वे किंग महेंद्र (King Mahendra) के नाम से मशहूर थे.

महेंद्र प्रसाद बिहार से सात बार राज्यसभा के लिए और एक बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे. उन्हें संसद के सबसे अमीर सदस्यों में से एक माना जाता था. वे अरिस्टो फार्मास्यूटिकल्स के संस्थापक थे.

किंग महेंद्र सबसे पहले 1980 में लोकसभा के लिए कांग्रेस के टिकट पर चुने गए थे. वे एक लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी में रहे. उसके बाद वे जनता दल में, फिर राष्ट्रीय जनता दल में और अंत में जदयू में शामिल हो गए.

इस कारण लगाया जाता था “किंग”

महेंद्र प्रसाद के नाम के आगे अक्सर ”किंग” शब्द लगाया जाता था, जिसका मतलब था ‘राजा’. उनके नाम के पहले लगने वाला यह शब्द इस बात का संकेत था कि उनपर अपने राज्य में राजनीतिक हवा के रुख में किसी भी बदलाव का कोई प्रभाव नहीं पड़ा. उन्होंने कभी राज्यसभा चुनाव नहीं हारा. चाहे पार्टी कोई हो, कुछ समय को छोड़कर वह 1985 से राज्यसभा में लगातार बने रहे. उन्होंने 2012 में जदयू के सीट से राज्यसभा सांसद चुने जाने पर एक इंटरव्यू में कहा था, ‘अगर राज्यसभा में एक ही सीट खाली होती, तो भी मैं ही चुना जाता.’

पीएम मोदी ने शोक व्यक्त किया

प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी किंग महेंद्र के निध पर कहा, ”मैं राज्यसभा सदस्य डॉ. महेंद्र प्रसाद जी के निधन से दुखी हूं. उन्होंने कई वर्षों तक संसद में अपनी सेवाएं दीं और वह कई सामुदायिक सेवा कार्यों में आगे रहे. उन्होंने हमेशा बिहार और उसके लोगों के कल्याण की बात की. मैं उनके परिवार के प्रति संवेदना प्रकट करता हूं. ओम शांति.”

नीतीश ने जताया शोक

जदयू नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किंग महेंद्र के निधन पर शोक व्यक्त किया. उन्होंने कहा कि महेंद्र प्रसाद का निधन समाज, राजनीति और उद्योग जगत के लिए बड़ी क्षति है. मुख्यमंत्री ने अपने शोक संदेश में कहा कि “वे एक कुशल राजनेता एवं प्रसिद्ध उद्योगपति थे. वे सरल स्वभाव के और काफी मिलनसार व्यक्ति थे. उनके निधन से राजनीतिक, सामाजिक एवं औद्योगिक क्षेत्र में अपूरणीय क्षति हुयी है”.

मुख्यमंत्री ने स्व0 महेन्द्र प्रसाद के भाई उमेश शर्मा उर्फ भोला बाबू एवं उनके पुत्र राजीव शर्मा से फोन पर बात की और उन्हें सांत्वना दी. मुख्यमंत्री ने दिवंगत आत्मा की चिर शान्ति तथा उनके परिजनों एवं प्रशंसकों को दुःख की इस घड़ी में धैर्य धारण करने की शक्ति प्रदान करने की ईश्वर से प्रार्थना की है.

महेंद्र प्रसाद से किंग महेंद्र बनने की कहानी

बिहार के जहानाबाद से करीब 17 किलोमीटर दूर गोविंदपुर गांव के एक भूमिहार परिवार में, एक साधारण किसान वासुदेव सिंह के घर महेंद्र प्रसाद का जन्म हुआ था. महेंद्र ने पटना कॉलेज से अर्थशास्त्र में बीए किया था. ग्रेजुएशन के बाद नौकरी नहीं लगने के कारण वह गांव चले गए.

गांव आकर वे काफी परेशान थे क्योंकि घर की माली हालत ठीक नहीं थी. इसी दरम्यान 1964 में उन्हें एक साधु मिला जिसने उनको एक पुड़िया दी और कहा कि इसे नदी किनारे जाकर सपरिवार खा लेना. इससे सारा दुख दूर भाग जाएगा. बेरोजगारी की मार झेल रहे महेंद्र को पता नहीं क्या सूझा, उन्होंने घर के लोगों को नदी किनारे ले जाकर पुड़िया दे दी और खुद भी खा लिया. इस घटना में महेंद्र के परिवार के दो लोगों की मौत हो गई.

इस हादसे में वे भी बीमार हो गए थे और उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया था. अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद वह गांव छोड़कर मुंबई चले गए. फिर अचानक 16 साल बाद वह 1980 में जहानाबाद लोकसभा चुनाव लड़ने वापस लौटे. उस वक्त वह कांग्रेस के उम्मीदवार थे. पहली बार जहानाबाद के लोगों ने चुनाव में एक साथ इतनी गाड़ियां और प्रचारकों को देखा था. गाड़ियों की चमक और पैसों की खनक ने लोगों के मन में उनकी छवि किंग वाली बना दी.

महेंद्र ने स्थानीय लोगों की मांग पर गरीब और वंचित लोगों के बीच उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए ओकारी, जहानाबाद में एक कॉलेज शुरू किया. इससे उन लड़कियों को भी मदद मिली जिन्हें उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाने की अनुमति नहीं मिलती थी. उनके परोपकारी कार्यों ने उन्हें युवाओं के बीच एक कल्ट के रूप में स्थापित कर दिया और एक साधारण किसान का बेटा ‘किंग’ कहा जाने लगा.

महेंद्र प्रसाद के बचपन के मित्र रहे राजाराम शर्मा ने एक अखबार से बातचीत में बताया था, ‘हादसे के बाद जब महेंद्र गांव छोड़कर गए तो उनके पास कुछ भी नहीं था, लेकिन जब लौटे तो किंग बनकर. वे एक छोटी दवा कंपनी में पहले साझेदार बने, फिर बाद में 1971 में 31 साल की उम्र में ही खुद की अपनी कंपनी बना ली.’ शर्मा के अनुसार, महेंद्र ने शिक्षक बनने के प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया था कि मर जाना पसंद करूंगा, पर नौकरी नहीं करूंगा.’

बताया जाता है कि साल 2005 में नीतीश कुमार के कहने पर उन्होंने JDU जॉइन की थी. बाद में JDU के एक वरिष्ठ नेता ने कहा था, ‘महेंद्र ने कभी भी किसी पद के लिए अपनी इच्छा नहीं जाहिर की, उन्हें बतौर राज्यसभा सांसद मिलने वाली पावर और सुविधाओं से ही खुशी मिलती है. उन्हें पता है कि कैसे बिजनेस और पॉलिटिक्स के बीच की दूरी मेंटेन करनी है.’

लोकसभा चुनाव हारने के बाद पहुंचे राज्यसभा

1984 में हुए लोकसभा के चुनाव में महेंद्र हार गये, लेकिन राजीव गांधी से उनके करीबी संबंध थे. इस कारण वह कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा पहुंच गए. उसके बाद से वह लगातार राज्यसभा के सदस्य रहे. यह उनका सातवां टर्म था. भले ही उनकी पार्टियों की सदस्यता बदलती रही हो, लेकिन वे हर बार राज्यसभा पहुंचने में सफल रहे. उन्हें कभी लालू प्रसाद ने तो कभी नीतीश कुमार ने राज्यसभा में भेजा.