कोरोनावायरस से संक्रमित फेफड़ों की पहली 3D इमेज; तस्वीर डरावनी और सफेद धब्बों से भरी

बीजिंग / न्यूयॉर्क (TBN रिपोर्ट)| चीन से निकल कर पूरी दुनिया में फैल रहे कोरोना वायरस ने आतंक मचा रखा है. दुनिया भर के वैज्ञानिक यह खोजने में लगे हैं कि कोरोनावायरस आखिर फैलता कैसे है और किस तरह शरीर को प्रभावित करता है. रिसर्च की इस दिशा में मेडिकल प्रोफेशनल्स और वैज्ञानिकों को एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है. यह उपलब्धि है संक्रमित मरीजों के फेफड़ों की 3D इमेज बनाना और उस इमेज से अंदरुनी स्थिति को समझना. चीन में कोरोनावारयस COVID-19 संक्रमण से मारे गए करीब 1000 से ज्यादा लोगों के पोस्टमॉर्टम से वैज्ञानिकों ने उनके फेफड़ों की स्थिति की 3D इमेज बनाई है.

वैज्ञानिकों द्वारा बनाई गई इस इमेज से यह पता चला कि कोरोना वायरस के संक्रमण से मनुष्य का दम कैसे घुटता है. ये तस्वीरें रेडियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ नॉर्थ अमेरिका (RSNA) ने जारी की है. संक्रमित फेफड़ों के एक्स-रे और सीटी स्कैन से सामने आया है कि COVID-19 से पीड़ित मनुष्यों के फेफड़ें चिकने और गाढ़े बलगम (म्यूकस) से भर जाता है. इस कारण पीड़ित व्यक्ति की सांस घुटने लगती है क्योंकि उसके फेफड़ों में हवा जाने के लिए कोई जगह बचती ही नहीं है.

दरअसल सांस घुटने का क्लू यानि संकेत संक्रमित फेफड़ों में उपस्थित सफेद धब्बों से मिला. COVID-19 से ग्रसित रोगियों के सीटी स्कैन से उनके फेफड़ों में सफेद धब्बों का पता चला. इन धब्बों को रेडियोलॉजिस्टों ने अपनी भाषा में ‘ग्राउंड-ग्लास ओपेसिटी’ कहा है, क्योंकि वे स्कैन पर खिड़कियों के शीशों पर लगे धब्बों जैसे ही दिखाई देते हैं. संक्रमित पीड़ितों के फेफड़ों के सीटी स्कैन से ऐसे पैच नजर आए जो निमोनिया में पाए जाते हैं. लेकिन, COVID-19 यानि कोरोना के मामले में ये बलगम ज्यादा ही गाढ़े पाए गए हैं और फेफड़ों में हवा की जगह कुछ और ही भरा हुआ नजर आया है.

वैज्ञानिकों द्वारा इस 3D इमेज के बनाने के बाद डॉक्टर फेफड़ों के एक्स-रे और सीटी स्कैन से ऐसे मरीजों की बहुत जल्दी पहचान कर पाएंगे जो कोरोना वायरस से गंभीर रूप से संक्रमित हैं और जिन्हें तुरंत सबसे आइसोलेट करने की जरूरत है. चीन के वुहान शहर से फैला कोरोनावायरस (कोविड-19) अब तक 120 से ज्यादा देशों में फैल चुका है. दुनियाभर में 4,640 लोग मारे गए हैं तथा एक लाख 26 हजार से ज्यादा लोग इन्फेक्टेड  हैं.

बताते चलें, ऐसे ही संक्रामक रोग ‘सार्स’  से 2002 में दुनियाभर में कई मौतें हो गई थी. उस वक्त कोरोना की तरह एक्स-रे और सीटी स्कैन से ऐसे ही निष्कर्ष सामने आए थे. ‘सार्स’ में भी फेफड़ों में सफेद और गाढ़े धब्बे दिखाई दिए थे और फेफड़ों में जहां जगह पर हवा होनी चाहिए थी वहां पर बलगम भरी थी.