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एक ऐसा शहर जहां रहने से होती है नकारात्मकता महसूस

जोहर बाहरू / मलेशिया (TBN – The Bihar Now डेस्क)|जी हां, मलेशिया में यह एक ऐसा ही शहर है जो वीरान है और यहां कोई नहीं रहता है. दरअसल यहां रहने से रहने वाले को नकारात्मकता महसूस होती है. यहां तक ​​कि आस-पास पहले रहने वाले निवासी भी यहां दोबारा आने से झिझकते हैं.

इस शहर में 10 लाख लोगों के रहने का इंतजाम हो रहा था, आज वहां कोई नहीं रहता है. यह शहर समंदर किनारे बसा है. यहां बड़ी बड़ी इमारतें, गोल्फ कोर्स, वॉटर पार्क, ऑफिस, बार और रेस्टोरेंट समेत तमाम तरह की सुविधाएं विकसित की गईं. हरियाली के बीच 1370 हेक्टेयर एरिया में आलीशान इमारतें खड़ी की गईं. लेकिन आज यहां कोई नहीं रहता. पूरा का पूरा शहर वीरान पड़ा है. इसका नाम ही घोस्ट टाउन यानी ‘भूतिया शहर’ रख दिया गया है.

यहां शुरुआती निवासियों में नाजमी हनफिया नामक एक आईटी इंजीनियर था, जिसने इस शहर के एक टावर ब्लॉक में समुद्र के दृश्य (sea view) वाले एक बेडरूम का अपार्टमेंट किराए पर लिया था. लेकिन केवल छह महीने के भीतर ही उसे यह जगह छोड़ने की हो गई. उसने बताया कि वहां एक अशांत और उजाड़ माहौल था.शहर को ‘भूतिया शहर’ बताते हुए उसने किसी भी वित्तीय नुकसान की परवाह किए बिना इस जगह से भागने की सोच ली.

हनाफिया ने फ़ॉरेस्ट सिटी में बिताए समय के बारे में कहा, “मुझे इस जगह से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन यह बहुत बुरा अनुभव था. यहां करने के लिए कुछ भी नहीं है. अब वहां नहीं रहेंगे. यहां तक ​​कि यात्रा के लिए वापस जाने पर भी मेरे “रोंगटे खड़े हो जाते हैं.”

मलेशिया के इस्कंदर क्षेत्र के बीच में यह शहर चीन की रियल एस्टेट कंपनी कंट्री गार्डन पैसिफ़िक व्यू के द्वारा बनाया जा रहा था और इस प्रोजेक्ट का नाम ‘फॉरेस्ट सिटी’ रखा गया. चीन ने मलेशिया को एक खूबसूरत शहर का सपना दिखाया था, लेकिन आठ साल बीतने के बावजूद ये वीरान पड़ा है. आज मलेशिया का ये शहर चीन की वजह से उस गुनाह की सजा भुगत रहा है, जो उसने कभी किया ही नहीं.

चीन ने इस प्रोजेक्ट की शुरुआत बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत 2016 में की थी. इसका काम देश की बड़ी कंपनी कंट्री गार्डन को दिया गया. कंपनी को 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक का काम मिला. 2016 में ही देश के क्लुआंग जोहोन में इस पर काम शुरू हो गया था. लेकिन तीन साल बाद कोरोना वायरस आ गया. इसके बाद यहां का काम अटक गया.

कोरोना वायरस जब तक गया, तब तक कंपनी की आर्थिक हालत खराब हो गई थी. उस पर 16 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है. आज इस प्रोजेक्ट को शुरू हुए 8 साल से ज्यादा का वक्त हो गया है. लेकिन केवल 15 फीसदी काम ही पूरा हो सका है. कहां 10 लाख लोगों के लिए घर बनाए गए थे लेकिन केवल एक फीसदी लोग ही रह रहे हैं. बाकी घर खाली पड़े हैं. न तो पार्क में कोई दिखता है, न ही मॉल में.

चीन की मंशा

चीनी सरकार ने आधिकारिक तौर पर कहा था कि यहां कोई भी घर खरीद सकता है. लेकिन असल में उसकी मंशा ये थी कि चीन के मध्य और अमीर वर्ग के लोग यहां पैसा लगाकर निवेश कर सकें, यानी घर खरीद सकें. वहीं मलेशिया के लोग यहां इसलिए रहने नहीं आते क्योंकि ये शहर वीरान है. यहां रहने से नकारात्मकता महसूस होती है.